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रचना क्षेत्र में मेरा पदार्पण अपनी सृजनात्मक क्षमताओं को निखारने के उद्देश्य से हुआ। लेकिन एक लेखक का जुड़ाव जब तक पाठकों से नहीं होगा , तब तक रचना अर्थवान नहीं हो सकती।यहीं से मेरा रचना क्रम स्वयं से संवाद से परिवर्तित होकर सामाजिक संवाद का रूप धारण कर लिया है।
कविता , शेर , ग़ज़ल , कहानियाँ , लेख लिखता रहा हूँ।

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दर्द अपने मैं काग़ज़ पर उतार देता हूँ
सिलसिला दर्द का थम गया होता, तू अगर मेरा ही बन गया होता, मुश्किलें मुझको तब तोड़तीं कैसे, सामने उनके तो मैं तन गया होता!... Read more
प्रेम का ज्वार-१
भाग-१- प्रेम का ज्वार ----------------- प्रीति बेलि जिनी अरुझे कोई,अरुझे मूए न छूटे सोई। प्रीति बेलि ऐसे तन बाढ़ा,पलुहत सुख बाढ़त दुःख बाढ़ा। प्रीति अकेली... Read more