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_” आतंकवाद से त्रस्त मन की पुकार “

aparna thapliyal

aparna thapliyal

कविता

April 15, 2017

मुझे नई सुबह की तलाशहै
रात के अँधेरे में
आग के घेरे में
जल रहा आज जिन्दगी का पलाश है
मुझे नई सुबह की तलाश है .
कहीं मारकाट मची हुई
कहीं साज़िशें हैं रची हुई
कहीं जिबह होती आस है
मुझे नई सुबह की तलाश है .
धुआँ धुआँ छिटका हुआ
चिंगारियों का नृत्य है
ज़लज़ला छाया हुआ
हवा भी बदहवास है
मुझे नई सुबह की तलाश है .
कहीं हत्या है
कहीं लूट है
कहीं बलात्कार की छूट है
राजे मुहब्बत सो रहा
इंसाँ का मन बेआस है
मुझे नई सुबह की तलाश है .
धरती है खून से सिंच रही
यारी की डोर है खिंच रही
अदालतें पंचायतें
सब लग रहीं
ज्यों हताश हैं
मुझे नई सुबह की तलाश है .
क्या बुद्ध ,ईसा सो गए
गाँधी, कबीर भी खो गए
कहते हैं कलयुग आ गया
राम और कृष्ण निराश हैं
मुझे नई सुबह की तलाश है
मुझे नई सुबह की तलाश है
अपर्णा थपलियाल”रानू”

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