कविता · Reading time: 1 minute

897 आँसू

आँखों के सागर में समेटे रखता हूँ आँसुओं को।
डरता हृँ, कहीं बह न जाएं, किसी के सामने।
दर्द सारा सँभाल रखा है सीने में अपने,
डरता हूँ जुबान कहीं ले ना आए किसी के सामने।

आजकल के दौर में काँधे कहाँ मिलते हैं,
सर रख के जिनपे में दो आँसू बहा लूँ।
सहारा नहीं मिलता किसी अपने का भी,
जिसे मैं दिल के दो बोल ही सुना दूँ।

भारी हुआ जाता है बोझ मेरे सीने का,
दब ना जाए कहीं यह सोच के डर जाता हूँ।
सागर आँखों का कहीं बह ना निकले सबके सामने।
इक कोना तलाश के रखता हूँ, मैं जहाँ भी जाता हूँ।

खुद के लिए तो मैं कभी जी ना सका इस दुनिया में,
वहीं मेरे ना हुए मैं जिन के लिए मिटा जाता हूँ।
कैसा है ज़माना जहाँ कोई नहीं है अपना,
वही है दर्द देने वाले ,जिन पर में लूटा जाता हूँ।

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