गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

वो एक अकेली पर, दो घर को संजोये है

“वो एक अकेली पर ,दो घर को संजोये है।
अनमोल खजाना है,बेटी में जो पाए है।”
ये रस्म विदा की इक आँगन से हुई जब भी,
छूटे वही सब रिश्ते,जो प्यार से बोये है।
वो छाव हुई आँचल,की अब है पराई माँ,
पुर धूप में हम जिसमें,बस चैन से सोये है।
दहलीज से बेटी को ,बस देख रहे बाबा,
कह पाए नहीं कुछ भी,वो आँख भिगोये है।
#रजनी

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