Skip to content

वो एक अकेली पर, दो घर को संजोये है

रजनी मलिक

रजनी मलिक

गज़ल/गीतिका

December 7, 2016

“वो एक अकेली पर ,दो घर को संजोये है।
अनमोल खजाना है,बेटी में जो पाए है।”
ये रस्म विदा की इक आँगन से हुई जब भी,
छूटे वही सब रिश्ते,जो प्यार से बोये है।
वो छाव हुई आँचल,की अब है पराई माँ,
पुर धूप में हम जिसमें,बस चैन से सोये है।
दहलीज से बेटी को ,बस देख रहे बाबा,
कह पाए नहीं कुछ भी,वो आँख भिगोये है।
#रजनी

Author
रजनी मलिक
योग्यता-M.sc (maths) संगीत;लेखन, साहित्य में विशेष रूचि "मुझे उन शब्दों की तलाश है;जो सिर्फ मेरे हो।"
Recommended Posts
((((((( बेटी ))))))) --------------------------------- जब शाम को घर को आऊ, वो दौड़ी-दौड़ी आए.... लाकर पानी पिलाए, बेटी...हॉ बेटी...., फिर सिर को मेरे दबाए, दिन भर... Read more
गाँव की बेटी
रिश्तों को पैसों से नही तोलती है वो हां वो एक गांव की बेटी है ।1। उसकी सुंदरता बाजारू सामान की मोहताज नही , वो... Read more
बेटी आ रही है आज
जब से सुना है पापा ने कि बेटी आ रही है आज, खुशी आँखों में समायी है उमंग ह्रदय में छायी है, लगे हैं तैयारी... Read more
बेटी (शायरी)
देवालय में बजते शंख की ध्वनि है बेटी, देवताओं के हवन यज्ञ की अग्नि है बेटी। खुशनसीब हैं वो जिनके आँगन में है बेटी, जग... Read more