कविता · Reading time: 1 minute

झूठ सच से क्या बोलता रहा

झूठ सच से क्या बोलता रहा
सच सच न रहा झूठ बन गया

नफरतों की आंधियों में प्यार
दुआ न हुआ टूटकर रह गया

लम्हा जो मासूम था रो पड़ा
बांध न पाया वक्त को खो गया

हम समय की गर्त में ढूंढते रहे
खारा पारी था उजाड़कर बह गया

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