Apr 22, 2021 · कविता
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21वीं सदी की ‘महामारी’

21वीं सदी की ‘महामारी’ है ,
जीवन लीला हमारी है,
प्रचंड है ,
दंड है,
इसके कई खंड है,
एक है, विश्व की तैयारी है ।

दमघोंटू है,
अशुद्ध है,
धरा की वायु तुम्हारी है,
प्राकृत है ,
शोक है,
आने-जाने पर रोक है ।

डर है,
भयंकर मर्ज है,
सेवा सुरक्षा यह फर्ज है,
जंग है,
आपस में हाथ तंग है ,
‘कोरोना’ के सब रंग हैं ।

बचाओ एक व्यंग है ,
दूर रहे ,
बचना एक मूल है ,
अशांति है ,
समाज में व्याप्त भ्रांति है ,
दुख की आज क्रांति है ।

वैश्विक ‘महामारी’ है ,
घर लौटने की बारी है ,
संक्रमण है ,
मानव संरक्षण है ,
जरूरतो की मारी है ,
सबकी भागीदारी है ।

लालच है,
बेकारी है,
मृत्यु की सवारी है,
आया यह लहर है,
लापरवाही है,
‘करोना’ बना कहर है ।

धैर्य रख,
थोड़ा ठहर,
औषधि चख,
हिम्मत कर,
‘कोरोना’ नहीं ,
विजय अब तुम्हारी है ।

रचनाकार-
#बुद्ध प्रकाश#

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Buddha Prakash
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