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2.मानवता

Versha Varshney

Versha Varshney

कविता

August 27, 2016

क्या जमाना आ गया खो गयी है मानवता ,
देख रहे जलते किसी को बचाने की फ़िक्र नहीं ,
मशगूल हैं वीडियो बनाने में, जिंदगी का मोल नहीं ।
गरीबी और अमीरी की कैसी है ये लड़ाई ,
ढो रहा पत्नी के शव को ,वो “दाना मांझी “,
किसी को उसकी फ़िक्र नहीं।
कहाँ सो गए गरीबों के रखवाले ,
विलुप्त हो गयी मानवता ।
हैरान हूं ये सोचकर ,क्या जंगल था वो इतना घना ?
चल रहा था एक मानव ,लाश को कंधे पर उठाये ,
क्या कोई नहीं था मानव वहां ?
हताश हूँ ये सोचकर ,क्यों नहीं आयी उनको दया ,
जब तोड़ रहे थे ,वृद्धा की हड्डी ,
क्या मर गयी थी मानवता ।
लगता है कृष्णा ,घोर कलयुग आ गया ,
आज तेरे भारत में राक्षसों का बोलबाला हो गया ।
शर्म आती है आज हमको खुद को इंसान कहने में ,
मानवता के नाम पर बसते हैं आज सिर्फ हैवान यहाँ ।
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

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Author
Versha Varshney
कवियित्री और लेखिका अलीगढ़ यू पी !_यही है_ जिंदगी" मेरा कविता संग्रह है ! विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेखन ! साझा संकलन -१.भारत की प्रतिभाशाली हिंदी कवयित्रियाँ ! २.पुष्पगंधा 3.संदल सुगंध Indian trailblazer women Award 2017 pride of the women... Read more

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