कविता · Reading time: 1 minute

13,अहसास

जर्रा जर्रा वक़्त का जैसे रो रहा था ,
आंसुओं से कोई चेहरा भिगो रहा था ।
मासूम थी मोह्हबत कहीं सिर झुकाए ,
हर घड़ी कोई दिल में यादों के जख्म चुभो रहा था।
प्यार की भाषा कब दे पाती है कोई परिभाषा ,
दिल क्यों दिल को यकीन दिला रहा था
दर्द था कोई मीठा सा अनजान की यादों का ,
सुनने को बेताब दिल आवाज किसी की,
दिल को खामोशी से सहला रहा था ।
कब समझती है मोह्हबत कायदे और कानून ,
एक भीगा सा अहसास जैसे कोई गुनगुना रहा था ।
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

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