Jun 10, 2021 · कुण्डलिया
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104 कुंडलियां अप्रैल 2021

[01/04, 10:11 AM] Ravi Prakash: *देह (कुंडलिया)*
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रहती है किसकी सदा ,मरती मानव-देह
एक दिवस मिट जाएगी ,करो न इससे नेह
करो न इससे नेह ,जिंदगी सौ वर्षों की
यही अधिकतम आयु ,मिली है उत्कर्षों की
कहते रवि कविराय ,समय की धारा बहती
गए त्याग सब देह ,कीर्ति यश – गाथा रहती
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*देह* = शरीर ,तन ,काया
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*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 999 761 5451*
[02/04, 10:16 AM] Ravi Prakash: *जन (कुंडलिया)*
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राजा – रानी अलविदा , अब जन की सरकार
जनप्रतिनिधि को जन चुने, यह जन का अधिकार
यह जन का अधिकार , राज्य का जन से नाता
पल में देश – प्रधान , एक भिक्षुक बन जाता
कहते रवि कविराय , बजाता सबका बाजा
जनादेश हर बार , बनाता अपना राजा
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*जन* = व्यक्ति , मनुष्य
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[02/04, 8:32 PM] Ravi Prakash: *निद्रा (कुंडलिया)*
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सुखदाई सबसे बड़ी , निद्रा है वरदान
जब आती इंसान को ,लगती स्वर्ग – समान
लगती स्वर्ग – समान ,नींद अति सुंदर प्यारी
इसके सम्मुख तुच्छ ,वस्तु जग की है सारी
कहते रवि कविराय, मौज की कुंजी पाई
सोओ घोड़े बेच ,स्वास्थ्य पाओ सुखदाई
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*सोओ घोड़े बेच* = एक मुहावरा जिसका मतलब चैन की नींद सोना है
*कुंजी* = ताले की चाबी ,किसी समस्या का हल
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[02/04, 8:35 PM] Ravi Prakash: *प्रार्थना (कुंडलिया)*
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देना है तो दीजिए ,प्रभु जी कुछ अपमान
गर्व न जिससे कर सकूं ,रहूं तुच्छ इंसान
रहूं तुच्छ इंसान , प्रशंसा शाप – सरीखी
प्रगति करें अवरुद्ध ,वृत्ति नूतन कब सीखी
कहते रवि कविराय ,नाव नित ऐसे खेना
रोज दिखाना दोष ,देह कंचन कर देना
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[03/04, 12:25 PM] Ravi Prakash: *मधुप (कुंडलिया)*
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मस्ती में जीता मधुप ,करता मधु का पान
सीखो इससे सभ्यता ,मधुर प्रणय-अभियान
मधुर प्रणय-अभियान ,प्रेम की दिव्य कहानी
कोमल मृदु आभास ,न इसका कोई सानी
कहते रवि कविराय , बसाता मन में बस्ती
जिसे छुआ वह मस्त , दौड़ती तन में मस्ती

*मधुप* = भौंरा, भ्रमर, मधु का पान करने वाला
*सानी* = तुलना ,मुकाबला

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[03/04, 2:34 PM] Ravi Prakash: *दुष्ट (कुंडलिया)*
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मारा जाता सर्वदा , जिसका दुष्ट स्वभाव
डंक हमेशा मारना , डँसने का नित चाव
डँसने का नित चाव ,सभी को दुख पहुंचाता
मिलना ज्यों अभिशाप ,कष्टप्रद जाना जाता
कहते रवि कविराय , मारता है जग सारा
लाठी जूता शस्त्र , सभी ने लेकर मारा
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[04/04, 9:40 AM] Ravi Prakash: *जगत यह किसकी रचना (कुंडलिया)*
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रचना किसकी है जगत ,अस्ति-नास्ति का भाव
इसी प्रश्न पर है सदा ,जग का रहता चाव
जग का रहता चाव , ईश को किसने देखा
निराकार वह ब्रह्म , ज्ञान की अंतिम रेखा
कहते रवि कविराय , विज्ञ कब चाहें बचना
रहते हर दिन खोज ,जगत यह किसकी रचना
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*अस्ति* = है ,विद्यमानता
*नास्ति* = नहीं है ,अविद्यमानता
*विज्ञ* = समझदार और पढ़े लिखे ,विद्वान, जानने वाले
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[04/04, 8:07 PM] Ravi Prakash: *मृत्यु (कुंडलिया)*
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जाना जग से कब भला , पाया कोई रोक
जाने का होता रहा ,हृदय विदारक शोक
हृदय विदारक शोक , अश्रु जाना सुन आते
जीवन के सब चित्र , एक माला बन जाते
कहते रवि कविराय ,जन्म ले जिसको आना
एक दिवस फिर मृत्यु , व्योम में छुप-छुप जाना
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[05/04, 1:03 PM] Ravi Prakash: *नीर (कुंडलिया)*
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करते प्रियजन जब विदा ,भर-भर आता नीर
संबंधी क्या मित्र क्या , होते सभी अधीर
होते सभी अधीर , फूटकर दिखते रोते
जिनको प्रीति विशेष ,भीतरी सुध-बुध खोते
कहते रवि कविराय ,लोग जाने क्यों मरते
क्यों निर्मम भगवान ,पाश क्यों बांधा करते
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*नीर* = जल ,पानी
*पाश* = बंधन ,बांधने का यंत्र
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[05/04, 1:55 PM] Ravi Prakash: *महिला-आरक्षण (हास्य कुंडलिया)*
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आई पत्नी एक दिन ,आरक्षण-वश काम
खड़ी चुनावों में हुई , लेकर पति का नाम
लेकर पति का नाम ,चित्र पत्नी का छोटा
पीछे हैं पतिदेव , चेहरा लेकर मोटा
कहते रवि कविराय ,धन्य जो पत्नी पाई
महिला मिली अमूल्य , भरोसे वाली आई
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[05/04, 2:00 PM] Ravi Prakash: *देह ( कुंडलिया )*
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रोई आत्मा सोच के ,खोनी पड़ती देह
नियम पुरातन है यही ,तन से कैसा नेह
तन से कैसा नेह ,देह नश्वर सब पाते
इससे करते प्रीति ,संग में हँसते – गाते
कहते रवि कविराय ,एक दिन ऐसी सोई
चिर निद्रा में लीन , देख फिर दुनिया रोई
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रचयिता: रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश )
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[05/04, 2:29 PM] Ravi Prakash: *अखबार (कुंडलिया)*
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रोजाना आता नई , खबरें ले अखबार
एक खबर अखबार में ,छपी एक ही बार
छपी एक ही बार ,रोज नित नूतन आती
घटनाक्रम हर रोज ,सूचना नव बन जाती
कहते रवि कविराय ,घोर अचरज है माना
भर जाता अखबार , विश्वक्रम से रोजाना
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[06/04, 10:51 AM] Ravi Prakash: *नारी (कुंडलिया)*
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छोड़ी घर की देहरी ,छोड़ा घर का द्वार
नई उड़ानें भर चली , नारी अब संसार
नारी अब संसार , न सीमा रही रसोई
नारी होती हीन , न कह पाता अब कोई
कहते रवि कविराय ,श्रेष्ठता नर की तोड़ी
नर को दिया पछाड़ ,पुरुष-निर्भरता छोड़ी
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*देहरी* = द्वार पर लगी चौखट की जमीन वाली लकड़ी या पत्थर ,दहलीज, घर के मुख्य द्वार का बाहरी भाग
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[06/04, 1:06 PM] Ravi Prakash: *आया फिर से लौटकर (कुंडलिया)*
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आया फिर से लौटकर ,अति घातक अभिशाप
लोगों को डँसने लगा , कोरोना चुपचाप
कोरोना चुपचाप , रुका फिर मिलना – जुलना
बंद लोक – व्यवहार , बंद विद्यालय – खुलना
कहते रवि कविराय , हुआ हर व्यक्ति पराया
डर लगता है कौन , संग कोरोना आया
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[06/04, 1:56 PM] Ravi Prakash: *चिट्ठी का पुराना दौर (कुंडलिया)*
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लिखते थे चिट्ठी कभी , हम भी प्रायः रोज
लिखकर लेटरबॉक्स की ,होती थी फिर खोज
होती थी फिर खोज ,पहुंच में दो दिन लेता
उत्तरदाता पत्र , प्राप्त कर उत्तर देता
कहते रवि कविराय , नहीं मोबाइल दिखते
पोस्टकार्ड थे आम , सभी थे इस पर लिखते
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[06/04, 3:14 PM] Ravi Prakash: *रोती कलम (कुंडलिया)*
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बेचारी रोती कलम ,कहती वह था दौर
मेरी तुलना में नहीं ,दिखता था कुछ और
दिखता था कुछ और ,चिट्टियाँ मैं ही लिखती
बैनर हों या बोर्ड , शान बस मेरी दिखती
कहते रवि कविराय , किंतु कलयुग में हारी
कंप्यूटर का दौर , आज हूँ मैं बेचारी
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[06/04, 4:23 PM] Ravi Prakash: *वोटरों से अपील ( हास्य कुंडलिया )*
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कहना मास्क लगाइए ,रहिए छह फिट दूर
गरज तुम्हारी है पड़ी , नेता तुम मजबूर
नेता तुम मजबूर ,नाक छिलने तक रगड़ो
किसका होगा वोट ,सभी प्रत्याशी झगड़ो
कहते रवि कविराय ,पड़ेगा उनको सहना
चार दिवस लो मौज ,वोटरों यह ही कहना
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[07/04, 8:35 AM] Ravi Prakash: *गली-गली में बल्लियाँ (कुंडलिया)*
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गली – गली में बल्लियाँ , घर-घर हुए मरीज
एक बरस में भी नहीं , ईश्वर रहे पसीज
ईश्वर रहे पसीज , वेदना में सब जीते
दिखती फिर से मौत ,घूँट विष के ज्यों पीते
कहते रवि कविराय ,व्यस्त सब चला-चली में
आशंकित भयभीत ,लोग फिर गली – गली में
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*वेदना* = कष्ट ,पीड़ा
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[07/04, 4:14 PM] Ravi Prakash: *दो गज (कुंडलिया )*
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कहते दो मीटर नहीं , कहते दो गज दूर
गज में नपती दूरियाँ ,आदत से मजबूर
आदत से मजबूर , भाव तोले का चलता
आता यह ही याद ,जीभ से यही निकलता
कहते रवि कविराय ,युगों तक रौ में बहते
थक जाता है दौर ,लोग फिर भी हैं कहते
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[08/04, 9:16 AM] Ravi Prakash: *शिखर (कुंडलिया)*
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पाने से ज्यादा कठिन ,टिकना हुआ कमाल
शिखर नुकीला कह रहा ,रखिए अपना ख्याल
रखिए अपना ख्याल ,रपटते इस पर भारी
बीते जब दिन चार , फिसल जाते नर नारी
कहते रवि कविराय , रोज के आने- जाने
कुछ हैं गिरे धड़ाम , लगे कुछ इसको पाने
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*शिखर* = सर्वोच्च स्थिति अथवा पद ,
पर्वत की चोटी
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[08/04, 11:14 AM] Ravi Prakash: *मृत्यु-विवाह-चुनाव (कुंडलिया)*
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मरने में पच्चिस जुटें , शादी करें पचास
रैली में नेता करें , अनगिन की पर आस
अनगिन की पर आस ,भीड़ वोटर की आई
जलसे और जलूस ,मास्क कब दिया दिखाई
कहते रवि कविराय , पुलिस कोटा भरने में
हालत है विकराल , न जीने में मरने में
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[08/04, 12:07 PM] Ravi Prakash: *आभूषण (कुंडलिया)*
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पहने टीका नारियाँ , नथनी से श्रंगार
तन पर शोभित हो रहे ,कुंडल चूड़ी हार
कुंडल चूड़ी हार , अँगूठी लगती प्यारी
हाथों में हथफूल , बंद बाजू का भारी
कहते रवि कविराय ,करधनी के क्या कहने
सौ – सौ गुना निखार ,हुआ जब गहने पहने
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*करधनी* = कमर पर पहनने वाली तगड़ी अथवा पेटी
*टीका* = माथे पर पहनने वाला आभूषण
*नथनी* = नाक में पहनने वाला आभूषण
*बाजूबंद* = बाँह में पहनने वाला आभूषण
*हथफूल* = हाथ की कलाई और उंगलियों में पहनने वाला आभूषण
[09/04, 11:26 AM] Ravi Prakash: *वोट दीजिए प्लीज (कुंडलिया)*
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कुर्ता पाजामा धवल , सुंदरतम है क्रीज
पहने नेता कह रहे , वोट दीजिए प्लीज
वोट दीजिए प्लीज ,धूल गलियों की खाते
जिनको मिलती जीत ,मजे ए.सी. के आते
कहते रवि कविराय , चतुर नेता हैं सुर्ता
धंधा हुआ चुनाव , कमाऊ पहने कुर्ता
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*क्रीज* = कपड़ों पर प्रेस करने से बनने वाली आकर्षक सिलवट
*सुर्ता* = सयाना ,चालाक ,होशियार
*धवल* =श्वेत ,उजला
[09/04, 4:52 PM] Ravi Prakash: *नया दिन ,नई रात (कुंडलिया)*
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आता है हर दिन नया ,लेकर नूतन प्राण
खींचो प्रत्यंचा धनुष ,साधो नव -नव बाण
साधो नव-नव बाण ,नया सूरज पहचानो
नई वायु की गंध ,नदी का पानी जानो
कहते रवि कविराय ,गीत पक्षी नव गाता
नया चाँद हर रात ,नई किरणों सँग आता
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*प्रत्यंचा* = धनुष की डोरी
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[09/04, 11:47 PM] Ravi Prakash: *बेचारा मास्क (हास्य कुंडलिया)*
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जुर्माने से बच सकें , इतना सिर्फ लगाव
वरना किसको है पड़ी , किसे मास्क का चाव
किसे मास्क का चाव ,नासिका – नीचे लटका
बना कंठ का हार ,कान – खूँटी पर अटका
कहते रवि कविराय , किसे डर छू जाने से
डर है केवल एक , सभी को जुर्माने से
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[10/04, 7:59 AM] Ravi Prakash: *भाई श्री ब्रज गोपाल व्यास(कुंडलिया)*
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भाई पर ऐसा चढ़ा , कुंडलिया का रंग
चार दशक बीते मगर ,यादों के हैं संग
यादों के हैं संग , याद कुंडलियाँ करते
होते स्वयं प्रसन्न ,हास्य जग में फिर भरते
कहते रवि कविराय,मदन शुभ किस्मत पाई
श्रीयुत ब्रज गोपाल ,व्यास-सम पाया भाई
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[10/04, 9:37 AM] Ravi Prakash: *नश्वर जगत (कुंडलिया)*
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रह जाता सब कुछ धरा ,मरने के फिर बाद
किसका कितना रह गया ,रहता किसको याद
रहता किस को याद ,न जाने कितना जोड़ा
धरा कह रही रोज , यहीं पर सब ने छोड़ा
कहते रवि कविराय ,जगत नश्वर कहलाता
तन नर्तन दिन चार , नहीं फिर तन रह जाता
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रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
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*धरा* = पृथ्वी ,जमीन पर रखना
[10/04, 10:39 AM] Ravi Prakash: *बच्चे बेचारे (हास्य कुंडलिया)*
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बच्चे बेचारे फँसे , फिरते हैं फटमार
एक साल से चल रहा ,छुट्टी का रविवार
छुट्टी का रविवार , जेब से रहते फूले
रोज सुबह से शाम ,खेल में सब कुछ भूले
कहते रवि कविराय ,पढ़ाकू रहे न सच्चे
अब सब एक समान , निखट्टू सारे बच्चे
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*फटमार* = अस्त-व्यस्त अवस्था
*निखट्टू* =निकम्मा ,आलसी ,बेकार ,
आरामतलब
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[10/04, 1:05 PM] Ravi Prakash: *जीत का मंत्र (हास्य कुंडलिया)*
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करना केवल यह रहा , बाँटो खूब शराब
चलता यही चुनाव में , कहते रहो खराब
कहते रहो खराब , जीत मदिरा से आती
जिसके बँटते नोट , फूलती उसकी छाती
कहते रवि कविराय,अकल ज्यादा मत चरना
अगर जीत की चाह , काम टुच्चे सब करना
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[10/04, 1:13 PM] Ravi Prakash: *शत्रु (कुंडलिया)*
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पक्षी को मिलता कहाँ , मनचाहा आकाश
बादल ढकते व्योम को ,रुकता सूर्य-प्रकाश
रुकता सूर्य – प्रकाश , दुष्ट रोड़े अटकाते
षड्यंत्रों के लक्ष्य , लोग भोले हो जाते
कहते रवि कविराय ,मनुज ही कुछ नरभक्षी
पशु का पशु ही भोज , शत्रु पक्षी के पक्षी
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[11/04, 11:11 AM] Ravi Prakash: *वोटर की लाटरी (हास्य कुंडलिया)*
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पूड़ी – हलवा बँट रहा , जैसे जिमी बरात
वोटर बोला वाह जी , वाह वाह क्या बात
वाह वाह क्या बात , मुफ्त में मदिरा पाई
भरे जेब में नोट , लाटरी ज्यों लग आई
कहते रवि कविराय ,चार दिन का यह जलवा
पाँच साल के बाद , मिलेगा पूड़ी – हलवा
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*जलवा* = शोभा ,तड़क-भड़क ,छवि ,छटा
*जिमी* = जीमना ,जिमाना ,भोजन आदर पूर्वक कराना
[11/04, 12:54 PM] Ravi Prakash: *अभिनंदन डॉक्टर (कुंडलिया)*
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अभिनंदन डॉक्टर तुम्हें ,रोगी देश कृतज्ञ
जान हथेली पर लिए , करते सेवा – यज्ञ
करते सेवा – यज्ञ , मौत के मुँह से लाते
मरणासन्न मरीज , सिर्फ तुम उसे बचाते
कहते रवि कविराय ,कह रहा है जन गण मन
तुम को कोटि प्रणाम ,तुम्हारा शत अभिनंदन
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*कृतज्ञ* = दूसरों द्वारा किए गए उपकार को मानने वाला
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[11/04, 4:17 PM] Ravi Prakash: *आया बैरी मास्क फिर (कुंडलिया)*
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आया बैरी मास्क फिर ,मुख गरीब मजबूर
भीड़-भाड़ खतरा समझ ,रहता दो गज दूर
रहता दो गज दूर , बंद शादी में जाना
रोक मृत्यु के शोक , रुका मरघट पहुँचाना
कहते रवि कविराय ,व्यक्ति हर हुआ पराया
जाने कैसा रोग , मुआ दोबारा आया
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[11/04, 5:38 PM] Ravi Prakash: *चुनाव की चिल्लपों (हास्य कुंडलिया)*
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पाँच बरस में दस दफा ,षट्मासिक मतदान
प्रतिदिन भाषण – रैलियाँ ,खाते रहते कान
खाते रहते कान , शहर – गाँवों में रोते
कभी केंद्र तो राज्य , रोज ईवीएम ढोते
कहते रवि कविराय ,चिल्लपों रखिए बस में
हो चुनाव बस एक ,समूचे पाँच बरस में
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*चिल्लपों* = चीख-पुकार ,चिल्लाहट ,शोरगुल
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[12/04, 10:49 AM] Ravi Prakash: *माँ ( कुंडलिया )*
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मिलता है अन्यत्र कब , माँ का वत्सल-भाव
दुनिया है गहरी नदी , नदिया में माँ नाव
नदिया में माँ नाव , अनूठा लाड़ लड़ाती
खुद बनकर कंगाल , स्वर्ण हमको दे जाती
कहते रवि कविराय ,कमल-मुख उसका खिलता
भाग्यवान वह एक ,जिसे माँ का सँग मिलता
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*वत्सल* = संतान के प्रति प्रेम या स्नेह
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*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
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[12/04, 12:02 PM] Ravi Prakash: *चुनाव-परिदृश्य (हास्य कुंडलिया)*
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सुनिए कैसे गा रहे , गीदड़ और सियार
दुर्लभ दृश्य अलाप के ,दिव्य चुनाव-प्रचार
दिव्य चुनाव-प्रचार ,चैन कब किसको आया
एक दुलत्ती मार , गधे ने गधा गिराया
कहते रवि कविराय ,जोंक या खटमल चुनिए
एक माह बकवास ,प्रमुख इन दो की सुनिए
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*अलाप* = संगीत की साधना
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रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451
[12/04, 12:12 PM] Ravi Prakash: *देखें चलें चुनाव (हास्य कुंडलिया)*
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गोली बंदूकें चलीं , चले तीर तलवार
हड्डी टूटी सिर फटे , हुए वार पर वार
हुए वार पर वार ,युद्ध का मौसम आया
मारकाट का दृश्य ,अराजकता की छाया
कहते रवि कविराय ,जहर की जैसी बोली
देखें चलें चुनाव , झेलने चलते गोली
★★★★★★★★★★★★★★★
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*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
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[12/04, 2:18 PM] Ravi Prakash: *नव वर्ष कौन ? (कुंडलिया)*
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आई पहली जनवरी ,चैत्र शुक्ल के पास
बोली मैं हारी सखी ,हुई फेल तुम पास
हुई फेल तुम पास ,बसंती मौसम छाया
कोयल गाती गान , बौर पेड़ों पर आया
कहते रवि कविराय ,साथ मैं ठिठुरन लाई
तुम लाईं नव – हर्ष ,प्रीत ऋतु तुमसे आई
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*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
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[12/04, 3:41 PM] Ravi Prakash: *नवसंवत नववर्ष (कुंडलिया)*
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आओ सब स्वागत करें ,भरकर नव-उल्लास
गाएँ भारत की कथा ,ऋषियों का विश्वास
ऋषियों का विश्वास ,वसंती ऋतु मदमाती
पेड़ों पर नव – पत्र , हर्ष भर कोयल गाती
कहते रवि कविराय ,भाव अपनत्व लुटाओ
हो सुखमय नववर्ष ,नया शुभ संवत आओ
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[13/04, 11:56 AM] Ravi Prakash: *प्रथम शैलपुत्री (तीन कुंडलियाँ)*
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गाओ पुत्री – दक्ष की ,पावन गाथा आज
हुईं सती क्यों किस लिए ,जानो इसका राज
जानो इसका राज , यज्ञ में मान न पाया
मैके में अपमान , सती को नहीं सुहाया
कहते रवि कविराय ,नेह की ज्योति जलाओ
शक्तिपीठ शिव – केंद्र ,ब्रह्म की महिमा गाओ

दोबारा आईं सती , बनकर पुत्री – शैल
मिटा पुराने जन्म का ,दुख का सारा मैल
दुख का सारा मैल , अपर्णा उमा कहाईं
गौरी गिरिजा पुनः , जगतपति शिव को पाईं
कहते रवि कविराय ,निरंतर तप के द्वारा
मिला दिव्य गंतव्य ,मिले शिव-पति दोबारा

बाएँ कर में है कमल , दाएँ धरे त्रिशूल
वृषभ सवारी कर रहीं , बिसराओ हर भूल
बिसराओ हर भूल ,सतत शुभ भाव जगाना
गौरी दो वरदान , लोभ से सदा बचाना
कहते रवि कविराय ,भरो निर्मल मति घर में
सपरिवार सद्बुद्धि ,कमल दो बाएँ कर में
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*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
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*अपर्णा* = तपस्या करते करते जब पार्वती जी ने पत्ते (पर्ण )खाना भी छोड़ दिया तो अपर्णा नाम पड़ा
*गंतव्य* = वह स्थान जहाँ कोई जाना या पहुँचना चाहता है
[13/04, 4:11 PM] Ravi Prakash: *गीता का ज्ञान 【कुंडलियाँ】*
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( 1 )
गीता सुनकर हो गया , अर्जुन का उद्धार
असमंजस जाता रहा ,दुविधा भरा विचार
दुविधा भरा विचार ,धनुष की डोरी तानी
दुर्योधन की और ,सहन अब कब मनमानी
कहते रवि कविराय ,युद्ध फिर सच ने जीता
धन्य धन्य श्री कृष्ण ,श्रेय सब तुमको गीता
. ( 2 )
गीता सिखलाती हमें , सही कर्म की राह
उसको मिलती राह है ,जिसके मन में चाह
जिसके मन में चाह ,झुका जो मस्तक आता
भरा शिष्य का भाव ,ज्ञान गुरु से फिर पाता
कहते रवि कविराय ,सरस अमृत जो पीता
हो जाता कल्याण ,धैर्य से सुनता गीता
(3)
गीता कहती युद्ध कर ,अर्जुन कर संग्राम
रण से डर कर भागना ,कायरता का काम
कायरता का काम ,मित्रता सच की सीखो
जब भी दीखो बंधु ,पक्ष में सच में दीखो
कहते रवि कविराय , युद्धरत है जो जीता
वही असल में पार्थ ,सुनी बस उसने गीता
(4)
गीता कहती हे मनुज ,तन को नश्वर जान
तन मरता है एक दिन ,जाता है शमशान
जाता है शमशान ,आग में जल-जल जाता
रहती आत्मा शेष , जला कब कोई पाता
कहते रवि कविराय ,रहा तन सच से रीता
आत्म-तत्व की खोज ,लक्ष्य बतलाती गीता
(5)
गीता कहती है सरल ,आत्म – तत्व का ज्ञान
जग में सबसे उच्च है ,प्रतिदिन पावन ध्यान
प्रतिदिन पावन ध्यान ,सरलता से लग जाता
बैठो सरल प्रकार , नेह की दौड़ लगाता
कहते रवि कविराय ,ध्यान-रस जो जन पीता
उसे मिला आनंद , अनोखा कहती गीता
(6)
गीता कहती मत करो ,तन की कुछ परवाह
इसकी निश्चित आयु है ,ज्यादा करो न चाह
ज्यादा करो न चाह ,मूल्य आत्मा का मानो
वस्तु एक अनमोल , ध्यान से यह पहचानो
कहते रवि कविराय ,आत्म में है जो जीता
पाता परमानंद , बताती पावन गीता
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[13/04, 7:36 PM] Ravi Prakash: *द्वितीय ब्रह्मचारिणी (कुंडलिया)*
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करतीं विचरण ब्रह्म में , माता तुम्हें प्रणाम
ब्रह्मचारिणी इसलिए , सही तुम्हारा नाम
सही तुम्हारा नाम , कमंडल कर में माला
चलतीं नंगे पैर , धन्य जीवन कर डाला
कहते रवि कविराय ,मलिन मति माँ तुम हरतीं
तुम में बसता ब्रह्म ,सिद्ध साधक तुम करतीं
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[13/04, 11:14 PM] Ravi Prakash: *किसको रोता कौन (हास्य कुंडलिया)*
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किसको फुर्सत है रखी ,किसको रोता कौन
खबर मिली जब चल बसे,रखा दो मिनट मौन
रखा दो मिनट मौन ,मौज फिर सबकी चालू
पूड़ी हलवा भोज , रायता टिकिया आलू
कहते रवि कविराय ,आयु पूरी कर खिसको
मुड़ो न देखो बंधु , शोक है कितना किसको
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[14/04, 10:43 AM] Ravi Prakash: *आभारी (कुंडलिया)*
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दाता तुमने जो दिया ,कोटि – कोटि उपकार
यह क्या कम है ढो रहा ,तन अपना खुद भार
तन अपना खुद भार ,धन्य प्रभु नित आभारी
चटनी रोटी दाल , रोज का भोजन जारी
कहते रवि कविराय ,सुखी हों सब प्रिय भ्राता
रखना तन को दूर ,रोग से हर क्षण दाता
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[15/04, 8:48 AM] Ravi Prakash: *तृतीय चंद्रघंटा (दो कुंडलियाँ)*
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मस्तक पर है चंद्रमा , घंटे का आकार
कही चंद्रघंटा गईं , देवी सिंह सवार
देवी सिंह सवार , युद्ध की मुद्रा पाई
अस्त्र-शस्त्र के संग,अलौकिक गुण वरदाई
कहते रवि कविराय ,दिव्य घंटे की दस्तक
करती रिपु संहार ,धन्य देवी का मस्तक

बजता है घंटा जहाँ , घंटे की आवाज
मातु चंद्रघंटा वहाँ , समझो माँ का राज
समझो माँ का राज ,असुर की वृत्ति मिटाता
घंटे का यह अर्थ ,सृजित शुभ मन कर जाता
कहते रवि कविराय , दिव्य मंदिर है सजता
सौम्य भाव साकार , मधुर ध्वनि घंटा बजता
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[15/04, 11:32 AM] Ravi Prakash: *नियति 【कुंडलिया】*
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होता है सबसे बड़ा ,सदा नियति का खेल
बड़े – बड़े जाते दिखे , इसके कारण जेल
इसके कारण जेल , सेठ निर्धन हो जाते
बौड़म जाते जीत , जीत मंत्री पद पाते
कहते रवि कविराय ,चतुर किस्मत को रोता
मूरख चलता चाल , माल सब उसका होता
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*नियति* = भाग्य
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[15/04, 10:21 PM] Ravi Prakash: *कोरोना से बचाव के उपाय (कुंडलिया)*
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घर से बाहर जाइए , अगर जरूरी काम
वरना घर में कीजिए , सारे दिन आराम
सारे दिन आराम ,सड़क पर मास्क लगाएँ
हर्गिज कभी न भूल ,भीड़ के भीतर जाएँ
कहते रवि कविराय ,सकारात्मक भीतर से
देगा शुभ परिणाम ,नहीं बस निकलें घर से
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[16/04, 8:14 AM] Ravi Prakash: *चतुर्थ कूष्मांडा ( कुंडलिया )*
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काशीफल अमृत भरा ,अर्पित सौ-सौ बार
माता कूष्मांडा करें , हे देवी स्वीकार
हे देवी स्वीकार , मंद मुस्कान तुम्हारी
इस जग का आधार ,सृष्टि की रचना प्यारी
कहते रवि कविराय ,सूर्य में रहतीं हर पल
अर्पित कुम्हड़ शाक ,तुम्हें देवी काशीफल
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*कुम्हड़* = काशीफल ,गंगाफल ,कद्दू
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*शाकुंभरी देवी (कुंडलिया)*
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माता शाक – प्रदायिनी , शाकुंभरी प्रणाम
दुर्गम – दैत्य विनाशिनी ,दिव्य कांति अभिराम
दिव्य कांति अभिराम ,सराल शाक उपजाई
बही नीर की धार , प्यास सब भूख मिटाई
कहते रवि कविराय ,शाक के गुण जो गाता
उसे मिला आशीष , उसे वर देतीं माता
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*सराल* = एक प्रकार की शाक जो देवी ने दिव्य रूप से प्रकट की
*दुर्गम*= एक दैत्य का नाम
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[16/04, 10:49 AM] Ravi Prakash: *मधुमास (कुंडलिया)*
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गाती वायु सुवास-भर ,आता जब मधुमास
भरती नई उमंग है ,भरती है जब श्वास
भरती है जब श्वास ,वसंती हर अंगड़ाई
चैत और बैसाख ,काम की मित्र कहाई
कहते रवि कविराय ,मधुर मस्ती है छाती
नर्तन करती देह ,मास-द्वय ऋतु जब आती
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*काम :* कामदेव
*मधुमास :* चैत और बैसाख के दो माह जो छह ऋतुओं में प्रथम वसंत ऋतु कहलाते हैं

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[17/04, 7:14 AM] Ravi Prakash: *पंचम स्कंदमाता (तीन कुंडलियाँ)*
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बरसातीं वात्सल्य – रस ,माता स्कंद कुमार
तीन लोक में छा रहा ,माँ का अद्भुत प्यार
माँ का अद्भुत प्यार ,गोद में सुत है भाता
जननी माँ तुम वीर ,वीर की हो तुम माता
कहते रवि कविराय , सिंह पर बैठी आतीं
कमल-पुष्प ले हाथ ,मातृ-सुख छवि बरसातीं

माता का नाता बड़ा ,सुत से माँ का नाम
गोद लिए माँ तृप्त तुम , पुत्र वीर अभिराम
पुत्र वीर अभिराम , रूप जननी का भाया
माता स्कंद कुमार , नाम तुमने कहलाया
कहते रवि कविराय ,मातृ-सुख की तुम दाता
नारी के सौ रूप , भव्यतम उसमें माता

माता के प्रिय पुत्र यह ,श्री श्री स्कंद कुमार
देवासुर संग्राम में , इनकी कीर्ति अपार
इनकी कीर्ति अपार ,युद्ध – नायक कहलाए
सेनापति का रूप , शौर्य से जग में छाए
कहते रवि कविराय ,वीर सुत माँ को भाता
कार्तिकेय तुम धन्य ,तुम्हें सुत पाकर माता
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[17/04, 11:52 AM] Ravi Prakash: *जिंदगी की मति मारी (कुंडलिया)*
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बीमारी सौतन बनी , रहती पाँव पसार
कौन हटाए अब इसे ,इससे सब लाचार
इससे सब लाचार ,स्वास्थ्य ने रंगत खोई
जब से इसका दौर , हमेशा पाते रोई
कहते रवि कविराय ,जिंदगी की मति मारी
सौतन लाया रोग , कुटिल छाई बीमारी
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[17/04, 2:48 PM] Ravi Prakash: *षष्ठम कात्यायनी (दो कुंडलियाँ)*
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माथा ऊँचा कर रही ,बेटी तुम्हें प्रणाम
बेटी से संसार में ,हुआ पिता का नाम
हुआ पिता का नाम ,खड्ग धारण संहारी
कात्यायनी महान ,कर रहीं सिंह सवारी
कहते रवि कविराय ,वीरता की यह गाथा
ऋषि की पुत्री-चाह ,कर गई ऊँचा माथा

माता हे कात्यायनी , तुम बल का भंडार
महिषासुर से मुक्ति का ,देवी तुम आधार
देवी तुम आधार ,सिंह पर रण को जातीं
धन्य तुम्हारा खड्ग ,जीत जिससे रिपु पातीं
कहते रवि कविराय , असुर मारा है जाता
तुमको सारा श्रेय , वीर ऋषि – पुत्री माता
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*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
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[18/04, 10:32 AM] Ravi Prakash: *सप्तम कालरात्रि (दो कुंडलियाँ)*
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काली छवि काला बदन ,बिखरे काले केश
कालरात्रि तुम माँ स्वयं ,हरतीं सारे क्लेश
हरतीं सारे क्लेश ,श्वास से अग्नि बरसती
तुम में बसता क्रोध ,मुंड की माला बसती
कहते रवि कविराय ,नमन शुभ देने वाली
लिए लौह का जाल ,असुर – संहारी काली

काली माता हैं कुपित ,क्रोधित है व्यवहार
असुरों से यह लड़ रहीं ,लिए तीक्ष्ण हथियार
लिए तीक्ष्ण हथियार ,नष्ट करतीं खल-कामी
इनका लक्ष्य विनाश,काल-क्रम की अनुगामी
कहते रवि कविराय , मुंड की माला वाली
करने जग संहार , चलीं संहारी काली
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[18/04, 11:32 AM] Ravi Prakash: *समर (कुंडलिया)*

प्रतिक्षण जग में चल रहा ,समर मृत्यु से रोज
आँखें मरघट की तरफ ,दो साँसों की खोज
दो साँसों की खोज , मौत ने कितने खाए
गिने आँकड़े बंधु , किंतु कब सब गिन पाए
कहते रवि कविराय ,काल का अपना है प्रण
जीवन का संघर्ष , नित्य अपना है प्रतिक्षण

रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451
[18/04, 11:57 AM] Ravi Prakash: *गगन (कुंडलिया)*
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पक्षी उड़ते हैं गगन , रहते हैं आजाद
देख इन्हें फिर आ गई ,बीते कल की याद
बीते कल की याद ,मुक्त थे आते – जाते
सड़क टहलते रोज ,भीड़ में जा बतियाते
कहते रवि कविराय,फोन पर केवल जुड़ते
रोता मन असहाय , देखकर पक्षी उड़ते
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रचयिता : रवि प्रकाश, बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451
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गगन = आसमान ,नभ
[18/04, 7:54 PM] Ravi Prakash: *कोहराम हे राम (कुंडलिया)*
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*मरने की खबरें मिलीं ,सुबह दोपहर शाम*
*मचा हुआ है हर दिशा ,कोहराम हे राम*
*कोहराम हे राम , चिता के लगते मेले*
*कौन बँटाए शोक ,कौन दुख खुद पर झेले*
*कहते रवि कविराय ,हवा में विष भरने की*
*चर्चा है चहुँ ओर ,आज केवल मरने की*
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*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
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[18/04, 9:21 PM] Ravi Prakash: *नवम सिद्धिदात्री (कुंडलिया)*
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*माता सिद्धि-प्रदायिनी ,लिए सौम्य मुस्कान*
*अष्ट – सिद्धि पावन मिले , दो ऐसा वरदान*
*दो ऐसा वरदान , पूर्णता छा – छा जाए*
*जग में रहे न काम्य ,तृप्ति भीतर से आए*
*कहते रवि कविराय ,नमन हे शुभ वरदाता*
*हों प्रसन्न जग-शक्ति ,जगत की मालिक माता*
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*सिद्धियाँ* = आठ प्रकार की अलौकिक
शक्तियों को सिद्धियाँ कहते हैं
*काम्य* = जिस की कामना की जाए
*तृप्ति* = संतुष्टि
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[18/04, 9:28 PM] Ravi Prakash: *मास्क लटकता (हास्य कुंडलिया)*
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*फिरते पहने मास्क हैं , जैसे करें मजाक*
*बच जाएंगे रोग से , मोटू जी क्या खाक*
*मोटू जी क्या खाक ,नाक से मास्क लटकता*
*हैं केवल आश्वस्त , न जुर्माना हो सकता*
*कहते रवि कविराय ,व्यूह में यम के घिरते*
*चारों खाने चित्त , फँसे अब भागे फिरते*
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[18/04, 11:13 PM] Ravi Prakash: *रामनवमी पर विशेष*
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*राम (कुंडलिया)*
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बीती सदियाँ राम हैं , भारत के उपमान
मर्यादा के हैं शिखर ,उज्ज्वल खिले विहान
उज्ज्वल खिले विहान ,वीर नवयुग रच जाते
गाथा धरा – मनुष्य ,भक्ति से जिनकी गाते
कहते रवि कविराय , राम के बिन है रीती
भारत की हर शाम ,सदी हर अब तक बीती
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*उपमान* = जिसकी उपमा दी जाए
*विहान* = प्रातः काल, सुबह
*रीती* = सारहीन ,खाली खोखली
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*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
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[19/04, 9:04 AM] Ravi Prakash: *मरने के इस दौर में (कुंडलिया)*
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*मरने के इस दौर में ,जीने की है चाह*
*जिंदा कैसे बच सकें ,दिखलाओ वह राह*
*दिखलाओ वह राह ,प्रभो बलवान बनाओ*
*हमको दो तरकीब ,कवच सुंदर पहनाओ*
*कहते रवि कविराय ,मंत्र दो दुख हरने के*
*पग-पग दिखती मौत ,हवा में कण मरने के*
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*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
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[19/04, 3:46 PM] Ravi Prakash: *सोमरस (कुंडलिया)*
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पीता था जो इंद्र रस ,गाथा गाता व्योम
लुप्त सोमवल्ली हुई ,वेदों की वह सोम
वेदों की वह सोम ,जड़ी-बूटी बलशाली
एक लता वह खास ,उमंगे भरने वाली
कहते रवि कविराय ,वर्ष सौ जीवन जीता
मिला दही मधु दुग्ध ,सोमरस था जो पीता
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*सोमरस* = ऋग्वेद के सातवें ,आठवें और नौवें मंडल के पचासियों मंत्रों में सोमरस की चर्चा है । यह एक वनस्पति /जड़ी- बूटी/ अथवा लता – पौधा होता था जिसे कूटकर तथा छानकर इसमें दूध दही शहद मिलाकर पेय पदार्थ तैयार होता था। इंद्र इसे सशरीर आकर सहर्ष ग्रहण करता था । यह बलवर्धक तथा उत्साहवर्धक होता था । अब सोम वनस्पति लुप्त हो चुकी है तथा सोमरस इतिहास का विषय मात्र है ।
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*रचयिता : रविप्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
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[19/04, 10:52 PM] Ravi Prakash: *पीने वाले (कुंडलिया)*
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पीने वाले चल दिए , देखो इनका रंग
देखा जिसने भी इन्हें ,देख रह गया दंग
देख रह गया दंग ,लॉकडाउन पर भारी
पंक्तिबद्ध क्या खूब ,शांतिप्रिय मदिराहारी
कहते रवि कविराय ,नशे में जीने वाले
भर – भर रहे खरीद , नगद में पीने वाले
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*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
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[20/04, 9:42 AM] Ravi Prakash: *अष्टम महागौरी (तीन कुंडलियाँ)*
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रोको अब छवि भय-भरी ,माँ पड़ता हूँ पाँव
रोको अब रोते शहर ,बुझे – बुझे – से गाँव
बुझे – बुझे से गाँव ,हुई मरघट – सी काया
माँ त्यागो विकराल ,भयंकर अब तो माया
कहते रवि कविराय ,अरे शिव!अब तो टोको
माँ को करो प्रसन्न ,रूप काली का रोको

काया – परिवर्तन हुआ ,काली गोरी – रूप
कालरात्रि मानो छँटी ,निकली उजली धूप
निकली उजली धूप ,सृष्टि सुख से मुस्काई
हँसे जगत के जीव ,हँसी हर मुख पर छाई
कहते रवि कविराय ,पुनः मृदु मधुमय माया
धन्य धन्य माँ आप , आपकी गोरी काया

मुस्कातीं अति शांत माँ ,होकर वृषभ सवार
गौरी गोरे रंग की , शुभ्र वस्त्र व्यवहार
शुभ्र वस्त्र व्यवहार ,दिव्य माता कल्याणी
पूजन से खुशहाल , सिद्धियाँ पाते प्राणी
कहते रवि कविराय ,अस्त्र सँग देवी आतीं
धारण किए त्रिशूल , अभय देतीं मुस्कातीं
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*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 99976 15451*
[20/04, 1:45 PM] Ravi Prakash: *आभूषण-प्रिय (कुंडलिया)*
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धन से कब होता जुड़ा ,खुशियों भरा स्वभाव
आभूषण – प्रिय नारियाँ , सुंदरता का चाव
सुंदरता का चाव , न खातीं हलवा – पूड़ी
फिर भी पहनें हार , नथुनिया बुंदे चूड़ी
कहते रवि कविराय , सजा है टीका तन से
मन से हैं धनवान ,भले ही निर्धन धन से
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*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश )*
*मोबाइल 99976 15451*
[20/04, 6:36 PM] Ravi Prakash: *चंचल धन (कुंडलिया)*
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जानो धन चंचल महा ,सही चंचला नाम
आज यहाँ कल है वहाँ ,चलना इसका काम
चलना इसका काम ,एक क्षण में उड़ जाता
किसके है यह पास ,सात पीढ़ी रह पाता
कहते रवि कविराय , तत्व धन का पहचानो
रहता यह दिन चार ,मुसाफिर इसको जानो
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*चंचल* = जो बराबर गतिशील हो ,
हिलने- डुलने वाला ,अस्थिर
*चंचला* = लक्ष्मी
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*रचयिता : रवि प्रकाश बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 99976 15451*
[21/04, 3:39 PM] Ravi Prakash: *पनिहारिन (कुंडलिया)*
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पनघट गायब हो गए ,पनिहारिन अब कौन
लोक-कथा में रह गई , घटना केवल मौन
घटना केवल मौन , न पानी भरने जाती
मटकी लेकर चित्र ,नायिका सिर्फ खिंचाती
कहते रवि कविराय ,भरो अब नल से झटपट
पानी भरने कौन , आजकल जाती पनघट
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*पनघट =* कुआँ या घाट जहाँ से पानी भरते हैं
*पनिहारिन =* वह स्त्रियाँ जो पनघट से पानी भरती हैं।
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*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर ( उत्तर प्रदेश )*
*मोबाइल 999761 5451*
[21/04, 3:55 PM] Ravi Prakash: *दुर्जेय ( कुंडलिया )*
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नहीं रुकेगी जिंदगी , प्रण है अब की बार
मरण भले दुर्जेय तुम ,रण फिर भी स्वीकार
रण फिर भी स्वीकार,चलेंगी सब गतिविधियाँ
नर्तन करते मोर , दिखेंगी उड़ती चिड़ियाँ
कहते रवि कविराय ,न डर से सृष्टि झुकेगी
जग की भव्य उड़ान ,चल पड़ी नहीं रुकेगी
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*दुर्जेय* = जिसे जीतना कठिन हो ,
जो जल्दी न जीता जा सके
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*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 99976 15451*
[22/04, 3:25 PM] Ravi Prakash: *धावक (कुंडलिया)*
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आगे बढ़कर जीतता ,धावक को दे मात
मंजिल उसको ही मिली ,चलता जो दिन-रात
चलता जो दिन-रात ,नहीं आलस है करता
बाधा कर हर पार ,नित्य जग में पग धरता
कहते रवि कविराय ,शशक-कछुआ दो भागे
कथा सर्व-विख्यात ,समर्पित कछुआ आगे
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शशक = खरगोश
धावक = दौड़ लगाने वाला
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रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451
[22/04, 3:52 PM] Ravi Prakash: *आपदा (कुंडलिया)*
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फिर आएगी आपदा , शायद अगले साल
फिर होगा सम्मुख खड़ा ,बैरी जग का काल
बैरी जग का काल , मारने फिर आएगा
फिर यह हाहाकार , जगत में मचवाएगा
कहते रवि कविराय ,धैर्य से टल जाएगी
सजग देखकर लोग ,न शायद फिर आएगी

*आपदा* = मुसीबत ,परेशानी

*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
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[22/04, 4:03 PM] Ravi Prakash: *आत्मज्ञान (कुंडलिया)*
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थोड़ा – सा जीवन बचा , लंबा बाकी काम
आत्मा को है जानना , क्या होती अभिराम
क्या होती अभिराम , देह से धोखा खाया
आत्म-तत्व का ज्ञान ,जान कब अब तक पाया
कहते रवि कविराय ,न प्रभु ने खुद से जोड़ा
कब आते हैं रोज , प्यार उनका बस थोड़ा

रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451
[22/04, 4:10 PM] Ravi Prakash: *पाया किसने आत्म को ? (कुंडलिया)*
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पाया किसने आत्मा को ,भाग्यवान वह कौन ?
शांत सौम्य अंतर्मुखी , रहता प्रायः मौन
रहता प्रायः मौन , नित्य जो ध्यान लगाता
अहित न जिसकी चाह , बैर को दूर भगाता
कहते रवि कविराय ,राग जिसने मधु गाया
धन्य-धन्य वह जीव ,आत्म को जिसने पाया

रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451
[23/04, 11:06 AM] Ravi Prakash: *फैला जग में रोग (कुंडलिया)*
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रखते हैं जिंदा धरा , निश्छल मन के लोग
कपट और छल से भरा ,फैला जग में रोग
फैला जग में रोग , मुनाफाखोरी व्यापी
ताकतवर हैं दुष्ट , दीखते हावी पापी
कहते रवि कविराय ,सत्व-गुण केवल चखते
निर्मल जिनके भाव ,लोभ कब मन में रखते
“””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””
*व्यापी* = व्याप्त ,चारों ओर फैला हुआ
*धरा* = जमीन ,पृथ्वी
*निश्छल* = जिसमें छल कपट नहीं हो,
सरल-स्वभाव
“”””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””
*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
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[23/04, 1:13 PM] Ravi Prakash: *ऑक्सीजन (कुंडलिया)*
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*जीना मुश्किल हो गया ,साँसों पर प्रतिबंध*
*खोज रही है नासिका ,ऑक्सीजन की गंध*
*ऑक्सीजन की गंध ,मौत से गज – भर दूरी*
*जीवन का संघर्ष , रह गया खानापूरी*
*कहते रवि कविराय,चैन-सुख सब कुछ छीना*
*बीमारी विकराल , कठिन इसके सँग जीना*
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*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
_मोबाइल 99976 15451_
[23/04, 8:41 PM] Ravi Prakash: *असली धन (कुंडलिया)*
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असली धन समझो यही ,तन-मन सेहतवान
रोगों से जो बच गया ,जिसके मुख मुस्कान
जिसके मुख मुस्कान , वही है सबसे प्यारा
बीमारी सर्वत्र , सजग कब लेकिन हारा
कहते रवि कविराय , सलामत हड्डी – पसली
पड़ा नहीं बीमार ,धनिक वह समझो असली
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रचयिता : रवि प्रकाश, बाजार सर्राफा
रामपुर( उत्तर प्रदेश )
मोबाइल 99976 15451
[24/04, 1:37 PM] Ravi Prakash: *शांत हे यम हो जाओ (कुंडलिया)*
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लाओ अब तो हे प्रभो ,जग का नव्य-विधान
रोको यह जलती चिता , बढ़ते यह शमशान
बढ़ते यह शमशान , हटे साँसो पर पहरे
अस्पताल – बीमार , घाव मत दो अब गहरे
कहते रवि कविराय , शांत हे यम हो जाओ
फिर से दो मुस्कान,खिलखिलाहट फिर लाओ
“””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””
*नव्य* = नया
*यम* = मृत्यु के देवता ,यमराज
“”””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””
*रचयिता: रवि प्रकाश, बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
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[24/04, 10:42 PM] Ravi Prakash: *करना-धरना कुछ नहीं (कुंडलिया)*
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चालू नेता दिख रहा , लिए सिर्फ आरोप
करना-धरना कुछ नहीं ,दिखलाता बस कोप
दिखलाता बस कोप ,दिखाता छलके आँसू
श्री विज्ञापन – वीर , दे रहा भाषण धाँसू
कहते रवि कविराय , रुला माहिर यह देता
करता चिंता खूब , डूबकर चालू नेता
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*कोप* = गुस्सा ,क्रोध
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*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 99976 15451*
[24/04, 11:30 PM] Ravi Prakash: *मुफ्त ऑक्सीजन देते (कुंडलिया)*
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देते ऑक्सीजन हमें , बरगद पीपल नीम
स्वास्थ्य-प्रदाता जानिए ,इनको वैद्य हकीम
इनको वैद्य हकीम ,जिंदगी इन से मिलती
जहाँ लगे यह पेड़ ,प्राकृतिक सुषमा खिलती
कहते रवि कविराय , न हमसे कौड़ी लेते
धन्य – धन्य तुम देव ,मुफ्त ऑक्सीजन देते
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*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 99976 15451*
[25/04, 5:26 PM] Ravi Prakash: *निर्मल मन के द्वार (कुंडलिया)*
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परमात्मा रहता खड़ा , निर्मल मन के द्वार
जहां कपट बिल्कुल नहीं ,जहां न छल-व्यवहार
जहां न छल-व्यवहार , सरलता शोभा पाती
मौन शांत मुस्कान , हमेशा प्रभु को भाती
कहते रवि कविराय , वही है शुद्ध महात्मा
जिसे न कोई बैर , मिले उसको परमात्मा
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*निर्मल* = शुद्ध ,जिसमें कोई मलिनता न हो
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रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451
[25/04, 6:18 PM] Ravi Prakash: *कुपित कुदरत (कुंडलिया)*
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कुदरत तुझको क्या हुआ ,करती क्यों संहार
कुपित हो रही किस लिए ,हम पर बारंबार
हम पर बारंबार ,साल – दर – साल सताती
लिए रूप विकराल ,युवा तक को खा जाती
कहते रवि कविराय ,हमारा मस्तक है नत
गलती कर दो माफ ,दया कर दो हे कुदरत
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*साल-दर-साल* = साल के बाद साल
*कुदरत* = प्रकृति
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*रचयिता: रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 99976 15451*
[25/04, 7:17 PM] Ravi Prakash: *वस्तु दो देना दाता (कुंडलिया)*
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दाता देना बस हमें , निर्मल मन अविराम
करें – विचारें जो सभी ,हों निश्छल अभिराम
हों निश्छल अभिराम ,लोभ से सदा बचाना
रूखी – सूखी श्रेष्ठ , पराई कठिन पचाना
कहते रवि कविराय ,समझ बस इतना आता
स्वस्थ – देह सद्बुद्धि , वस्तु दो देना दाता
“”””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””
रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451
[26/04, 11:12 AM] Ravi Prakash: *असली धन है स्वास्थ्य (कुंडलिया)*
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काया अच्छी चल रही ,दया तुम्हारी नाथ
सिर पर रखना नेह का ,हरदम अपना हाथ
हरदम अपना हाथ , रोग से हमें बचाना
नहीं काल का नाच ,भयंकर प्रभो नचाना
कहते रवि कविराय ,स्वर्ण चाँदी सब माया
असली धन है स्वास्थ्य ,निरोगी सुंदर काया
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*रचयिता : रवि प्रकाश , बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 99976 15451*
[26/04, 9:01 PM] Ravi Prakash: *पेटू यह यमराज (कुंडलिया)*
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खाता काल मनुष्य को ,बिछड़े मन के मीत
राहों में जो जन मिले , होते कालातीत
होते कालातीत , काल का चाबुक चलता
क्षण में दृश्य अतीत ,हाथ मानव फिर मलता
कहते रवि कविराय , सताने निर्मम आता
पेटू यह यमराज , अनवरत दिखता खाता

*कालातीत* = जिसका समय बीत गया हो, काल से परे

रचयिता : रवि प्रकाश, बाजार सर्राफा
रामपुर( उत्तर प्रदेश )
मोबाइल 99976154 51
[27/04, 3:27 AM] Ravi Prakash: *शव-यात्राएँ मौन( कुंडलिया )*
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खोते अपने जा रहे , रोजाना की बात
एक झड़ी – सी लग रही , जैसे हो बरसात
जैसे हो बरसात , रोज अपनों को खोया
हृदय सह रहा घात ,फफक कर प्रतिदिन रोया
कहते रवि कविराय , चिता-मरघट-जन रोते
शव – यात्राएँ मौन , मनुज अपनों को खोते
■■■■■■■■■■■■■■■■■■
*रचयिता :रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 99976 15451*
[27/04, 10:52 AM] Ravi Prakash: *कुशलक्षेम का पत्र (कुंडलिया)*
🔵🔵☘️🍃🌿🔵🔵☘️🍃🌿
यहाँ कुशलता रेंगती , वहाँ बताएँ मित्र
बूढ़ों – बच्चों के सहित ,घर का खींचें चित्र
घर का खींचें चित्र , बुरी आई बीमारी
दो साँसों की चाह , वेंटिलेटर पर भारी
कहते रवि कविराय ,शांत यदि दिन है ढलता
रोए अगर न भोर , समझिए यहाँ कुशलता
🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
*कुशलक्षेम* = राजीखुशी ,कुशलमंगल
🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍂
रचयिता :रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451
[27/04, 2:14 PM] Ravi Prakash: *संचित कर्म (कुंडलिया)*
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देते फल हैं सर्वदा , जग में संचित कर्म
अच्छा या मिलता बुरा ,उसका यह ही मर्म
उसका यह ही मर्म ,कर्म से कब बच पाता
पीछा करता कर्म , दूर तक दौड़ा आता
कहते रवि कविराय , हमेशा वापस लेते
मिलता वह ही लौट ,प्रकृति को जो हम देते
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
संचित = इकट्ठा या जमा किया हुआ
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 99976 15451*
[27/04, 7:26 PM] Ravi Prakash: *शादी हो या मौत (कुंडलिया)*
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अपने – अपने कब रहे ,अपने दो गज दूर
रोग चला ऐसा मुआ ,सब अपने मजबूर
सब अपने मजबूर ,किसी के घर कब जाते
शादी हो या मौत ,चार अपने कब आते
कहते रवि कविराय ,आज हैं केवल सपने
सुख – दुख में हो भीड़ ,बंधु बैठें सँग अपने
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 99976 15451*
[27/04, 11:17 PM] Ravi Prakash: *श्री हनुमान जी (दो कुंडलियाँ)*
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रामकथा के शीर्ष हैं , बलशाली हनुमान
इनके बिन बचती कहाँ ,लक्ष्मण जी की जान
लक्ष्मण जी की जान ,सिया का पता लगाया
गए समंदर पार , अँगूठी को शुभ पाया
कहते रवि कविराय ,निवारक राम-व्यथा के
महावीर तुम धन्य ,शिखर तुम रामकथा के

होते अगर न बल – भरे ,पवन – पुत्र हनुमान
सीता जी की खोज क्या ,हो पाती आसान
हो पाती आसान , कौन लंका को जाता
कौन अकेला कूद ,पार सागर कर पाता
कहते रवि कविराय , हाथ के उड़ते तोते
बनते कैसे काम ,नहीं हनुमत यदि होते
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
*हाथ के तोते उड़ना* = दुख से हैरान होना,
स्तब्ध होना
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 99976 15451*
[28/04, 11:14 AM] Ravi Prakash: *हैप्पी बर्थडे सुकृति अग्रवाल (कुंडलिया)*
💐🍃🍃🟡🟨🍃🍃💐
पाओ ढेर बधाइयाँ , उमर हुई दस साल
सदा यशस्वी बन उठो ,जीतो नश्वर काल
जीतो नश्वर काल ,बाल – कवयित्री जय हो
तुम गाओ रस-राग ,स्वरों में मिला अभय हो
कहते रवि कविराय ,जहाँ भी जग में जाओ
मिले ढेर सम्मान , हमेशा खुशियाँ पाओ
🟥🟥🟥💐💐💐🟨🟨🟨
*सप्रेम भेंट : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 99976 15451*
*दिनांक 28 अप्रैल 2021 बुधवार*
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*यशस्वी* = प्रसिद्ध ,मशहूर ,सुविख्यात
*नश्वर* = नाशवान ,नष्ट होने वाला
*काल* = समय
*अभय* = जिसे भय न हो
[28/04, 1:00 PM] Ravi Prakash: *पड़ी अधर में जान (कुंडलिया)*
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रोजाना कुछ मर रहे ,कुछ अधमरे-समान
अस्पताल- कुछ घर पड़े ,पड़ी अधर में जान
पड़ी अधर में जान ,बेड के कुछ को लाले
ऑक्सीजन की चाह ,राह पर लटके ताले
कहते रवि कविराय ,कठिन मरघट को पाना
चलती वेटिंग – लिस्ट ,यहाँ पर भी रोजाना
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*अधर* = धरती और आकाश के बीच का स्थान
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*रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 99976 15451*
[28/04, 3:01 PM] Ravi Prakash: *शमशान घाट (कुंडलिया)*
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छोटे अब पड़ने लगे , शमशानों के घाट
मृत्यु मनुज को खा रही ,दीमक जैसे चाट
दीमक जैसे चाट , चौगुनी आती लाशें
अपने किसके कौन ,रोज का काम तलाशें
कहते रवि कविराय ,न दो यम जिद पर अड़ने
चलो चलें सब लोग , मृत्यु के पैरों पड़ने
~~~~~~~~~~~~~~~~🍂🍂
*पैरों पड़ना* = क्षमा मांगना ,हार मानना,
अतिशय आदर देना
~~~~~~~~~~~~~~~~~🍃🍃
रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451
[29/04, 12:27 PM] Ravi Prakash: *सिस्टम सारा फेल (कुंडलिया)*
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आई रोग विभीषिका ,सिस्टम सारा फेल
मारामारी बेड की , ऑक्सीजन का खेल
ऑक्सीजन का खेल ,दवाई कब मिल पाई
नहीं मिल रहा हाय , वेंटिलेटर दुखदाई
कहते रवि कविराय , मुसीबत कैसी छाई
अकथनीय है कष्ट , भयंकर विपदा आई
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रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
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[29/04, 1:13 PM] Ravi Prakash: *दवा – कालाबाजारी (कुंडलिया)*
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काला धंधा कर रहे , तन के गोरे लोग
अवसर इनको मिल गया ,जग में फैला रोग
जग में फैला रोग , दवा – कालाबाजारी
ऊँचे लेते दाम , मरीजों की लाचारी
कहते रवि कविराय ,बना जो यों धनवाला
होगी कोठी कार , रहेगा पर मुँह – काला
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रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451
[30/04, 11:25 AM] Ravi Prakash: *प्राणवायु की चाह (कुंडलिया)*
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चलती बोझिल जिंदगी , मंथर श्वास – प्रवाह
सारा जग रोगी बना , प्राणवायु की चाह
प्राणवायु की चाह , मौत सिरहाने आई
अस्पताल में बेड , एक मिलना कठिनाई
कहते रवि कविराय ,नियति निष्ठुर जब छलती
निर्धन – धनी समान ,किसी की कब है चलती
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
प्रवाह = चलता हुआ क्रम ,सिलसिला
मंथर = हल्की गति ,धीमा
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रचयिता : रवि प्रकाश, बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश )
मोबाइल 99976 15451
[30/04, 11:38 AM] Ravi Prakash: *सबसे मुश्किल दो काम (कुंडलिया)*
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मुश्किल सबसे हो गए , दुनिया में दो काम
अस्पताल में बेड या ,ऑक्सीजन अविराम
ऑक्सीजन अविराम ,वेंटिलेटर कब मिलता
बुरा हाल है बंधु , देख सर्वश्रेष्ठ शिथिलता
कहते रवि कविराय ,धड़कता आशंकित दिल
मरण खड़ा विकराल ,साँस का लेना मुश्किल
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
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