? माँ के साथ...माँ के बाद...

? दो मुक्तक ?

*माँ के साथ*

मिली माँ मुझको सजदे में कभी जब भी हुई देरी।
सदा लेकर के पहलू में छुपा दीं गलतियाँ मेरी।
मैं माँ के “तेज” से सीढ़ी चढ़ा हूँ ये बुलन्दी की।
“चरण माँ के छुए” जब भी “इबादत” हो गयी मेरी।

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*माँ के बाद*

व्याकुल होकर हम ग़ाफ़िल से घूम रहे संसार में।
ढूंढ़ रहीं हैं “माँ” को आँखें आज तलक घर द्वार में।
बरकत,प्रेम “इबादत” उसके साथ ही नाता तोड़ गयीं।
‘तेज’ जली होली रिश्तों की दुनियां के बाजार में।

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?तेज15/5/17✍

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