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--छप्पय छंद--

परिभाषा
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रोला+उल्लाला=छप्पय छंद
छप्पय छंद में कुंडलिया छंद की तरह छह चरण होते हैं,
प्रथम चार चरण रोला छंद के जिसके प्रत्येक चरण में 24-24 मात्राएँ होती हैं,यति 11-13 पर होती है।
प्रत्येक चरण के अंत में दो गुरू या एक गुरू दो लघु या दो लघु एक गुरू का होना अनिवार्य है।
आखिर के दो चरण उल्लाला छंद के होते हैं,जिसके प्रत्येक चरण में 28-28 मात्राएँ होती हैं और यति 15-13 या 13-15 या 13-13 पर होती है।

चरणांत में दो गुरू(ss) या एक गुरू दो लघु(s।।) या दो लघु एक गुरू(IIS) आना अनिवार्य है।
छप्पय एक अर्द्ध सममात्रिक छंद है।
जो अतिसुंदर है।

उदाहरण-
तन-मन अपना मान,रखना सदा ही पावन।
रोग दोष से दूर,आनंद बरसे सावन।
खुलें सफलता द्वार,जागे पुलकित सवेरा।
जीवन जैसे फूल,रहता सुरभि का डेरा।
स्वर्ग हो जाए धरती,जब लोग होंगे सज्जन।
देव आने को आतुर,अरे ललचाएंगे मन।।

राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”
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