#छप्पय छंद

#परिभाषा
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रोला+उल्लाला=छप्पय छंद

छप्पय छंद में कुंडलिया छंद की तरह छह चरण होते हैं,
प्रथम चार चरण रोला छंद के होते हैं ; जिसके प्रत्येक चरण में
24-24 मात्राएँ होती हैं,यति 11-13 पर होती है।

प्रत्येक चरण के अंत में दो गुरू या एक गुरू दो लघु या
दो लघु एक गुरू का होना अनिवार्य है।

आखिर के दो सम चरण उल्लाला छंद के होते हैं।
प्रत्येक चरण में 26-26 मात्राएँ होती हैं।
चरण की यति13-13 मात्राओं पर होती है ;
जो दोहा छंद के विषम चरणों की तरह ही होते हैंं।
जिसमें ग्यारहवीं मात्रा लघु और इसके बाद एक गुरू या
दो लघु मात्राएँ होनी अनिवार्य हैं।

इस प्रकार रोला और उल्लाला छंद मिलकर छप्पय छंद बनाते हैं।
यह एक प्राचीन छंद है।
-इसे उदाहरण द्वारा ठीक प्रकार से समझा जा सकता है।

उदाहरण-

तन – मन है अभिमान , सदा रखना तुम पावन।
रोग दोष से दूर , आनंद बरसे जीवन।
खुलें सफलता द्वार , जागे पुलकित सवेरा।
क़दम – कदम पर देख , सुरभि का रहता डेरा।-(रोला)

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धरा बने जब स्वर्ग – सी , प्रेम भरे हों गान सब।
आना चाहें देव भी , समझें इसको आन सब।-(उल्लाला)

आर.एस. “प्रीतम”
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आर.एस. प्रीतम
आर.एस. प्रीतम
जमालपुर(भिवानी)
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प्रवक्ता हिंदी शिक्षा-एम.ए.हिंदी(कुरुक्षेत्रा विश्वविद्यालय),बी.लिब.(इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय) यूजीसी नेट,हरियाणा STET पुस्तकें- काव्य-संग्रह--"आइना","अहसास और ज़िंदगी"एकल...
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