कविता · Reading time: 1 minute

? सफर ये कैसा सफर?

? “सफ़र ये कैसा सफ़र”?
” दुनियाँ एक सराय हम मुसाफिर
आँख क्यों न भर आये ,पहले बता
परमात्मा ?तुमने जज़्बात क्यों बनाये?

“चाह थी जो पाया नहीं ।
जो पाया वो चाहा नहीं
फिर जो पाया उसी को चाह लिया”।।

प्रकृति ने दिये अनमोल ख़जाने
पर हम बन के सयाने ,भरते रहे झूठे
खजाने ।।

दुनियाँ का सफ़र ,सुहाना सफ़र
उस पर रिश्तों का बन्धन,
रिश्तों संग दिलो में जज़्बात ।।

दिलों में प्रेम की जोत
हर कोई किसी न किसी की जीने की वज़ह
फिर कह दो दुनियाँ एक सराय
इतनी बड़ी सराय ,लम्बा सफ़र
इन्सान मुसाफिर ।।।।।

दूँनियाँ की सराय में मैं मुसाफिर
फिर सफ़र के हर लम्हें में क्यों
ना आनन्द उठाया जाये ।।

सफ़र का आंनद लेना सीखो मेरे अपनों
सफ़र का हर लम्हा हमें कुछ न कुछ सीखा जाता है ।

जो पत्थर पैरों में कंकड़ बन चुभते हैं ,वही पत्थर
हमारे घरों की दीवारें बनाते हैं ।

कोई सूखे पत्ते देख उन्हें व्यर्थ समझता है
कोई उन्ही सूखे पत्तों से अपना चूल्हा जला लेता है।

पापी पेट का सवाल है ,कोई अपने घर के कूड़े को
बहार फैंकता है ।, कोई भूखा उसी कूड़े को अपने
भोजन वज़ह बना लेता है ।।



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