????बेटी की व्यथा????

???तुम्हारी परवरिश में कमी नहीं है माँ??? बेटी की व्यथा????????

माँ!
तेरी ये बेटी आज बड़ी हो गई
जिन रास्तों पर तूने चलना सिखाया ,
उन्हीं रास्तों पर मैं खड़ी हो गई।।
ये देखकर मैं स्तब्ध हूँ…. कि,
तुमने जो -जो सिखाया,
वह हर एक बात सही है।
सिवाय एक बात के……..
# माँ ! मेरा….. तेरे गर्भ से लेकर…..
वर्तमान तक का सफर…….
बड़ा आसान, सुखद, अविस्मरणीय है।
आज मैं समाज में हो रही…घटनाओं को देखकर..
मजबूर सी बैठे-बैठे सोचती हूँ …..
कि… माँ-बाप कितने दोषी है?
इन घटनाओं को अंजाम तक पहुँचाने में….
# याद आती है आपकी वह बात…
जो आप पापा के विरोध में कहा करती थी….
यह आज का फैशन है…..और……..
पापा आधे कपड़ो को देखकर भी ..
सहम के रह जाते, कुछ न कह पाते
आपकी जिद के सामने….
★वो मेरा स्कर्ट……बड़ी मुश्किल से….
जिससे में अपनी जंघाओं को ढक पाती।
वो टॉप…. जिसमें …….
पीछे सिवा लैश के और कुछ नहीँ….
तब मैंने पहना …पहना …ना माँ..★
वो जीन्स वो टी शर्ट….. जो तूने पहनाए पहनती.रही…….
और सोचते रही,
माँ… तब तो मैं बच्ची थी।
समझ नही थी पर तुम तो समझदार थी माँ….
पापा तो विरोध कर सकते थे न माँ….
मगर, तुम दोनों ने ऐसा कभी नहीं किया..
और करते भी कैसे?
तुम्हारे पास तो नौकरी के अलावा……
कुछ सोचने के लिए समय ही नही था………..।
एक दिन मिलता वो भी रविवार तो…
तुम दिन भर के काम के बाद…
शाम को आलीशान रेस्टोरेंट में ले जाकर…
तरह-तरह के व्यंजन मंगाती और खिलाती…।।
हम दोनों बहन-भाई देर रात तक,
तुम्हारे साथ शॉपिंग मॉल में शॉपिंग करते,
घर आते और सो जाते….बस माँ….बस…।
तुम्हारी परवरिश में कहीं कोई कमी नही थी माँ…
बस एक के अलावा……..कि…
तुमने हमें जहाँ की खुशियाँ दी……
बस नहीं दे पाए तो …..समय……. माँ.
काश ! कि मम्मी-पापा,
तुमने हमें समय दिया होता।
तो हम भी सीख पाते * अच्छे संस्कार*
हमने तो बस वही सीखा…….
जो “आया” गंगू बाई ने सिखाया,
तुमसे ज्यादा अपनापन तो बाई ने दिखाया।
वह भी कितना सिखाती …… पड़ी-लिखी कम थी
जो समाज में देखती , हमसे आकर कहती।
हम जब भी घर के बाहर जाते वैसा ही पाते।
गंगू की हर बात याद रखते…और सोचते….
काश ! मम्मी-पापा यह सारी बातें हमसे कहते……
और बताते कि क्या अच्छा है क्या बुरा……?
फिर भी माँ आप लोगों से कोई गिला नहीं है।
आज हम समझदार है, भटकेंगे नहीं।।
??बस तुमसे एक विनती है…..??
तुम मेरी यह बात सबके सामने पढ़ना…
और खास कर सब माताओं से……
यह जरूर कहना ……कि
फैशन के नाम पर हम बेटियों को ….
कम कपड़े ना पहनाए।।
नौकरी की होड़ में सारा जीवन न बितायें….
कुछ समय बच्चों के साथ बितायें….
पापा के साथ जाकर दादा-दादी को….
आश्रम से घर वापस ले आएं।।
और हाँ अपने बच्चों के साथ-साथ..
मोहल्ले के सभी बच्चों को अच्छे संस्कार देना।
एक अच्छी दिशा देने का प्रयास करना।
ताकि हम एक आदर्श समाज की स्थापना कर सके।
जहाँ बेटियाँ कपड़ों से नहीं आदर्शों से पहचानी जाए।।
और बेटे कभी गुनाह की राह न चल पायें।।
माता-पिता युगों-युगों तक सभी के दिल में बसे रहें।।

तुम्हारी बेटी…..

कलम से

संतोष बरमैया “जय”

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