सब कुछ आधा लगा...!

तुम्हारे चेहरों के सामने सब कुछ सादा लगा ।
चाँद पुरे थे आसमाँ में फिर भी मुझे आधा लगा ।

इश्क़ ,मोहब्बत सब एक ही जैसे है ,
हमें तुम्हारे इश्क़ में भी कुछ ज्यादा लगा ।

तुम्हारी बेरुखी की क्या मिसाल दू अब ,
तुम्हारी नफ़रत भी प्यार से कुछ ज्यादा लगा ।

तुम्हें चाहने में हमने ख़ुद को यहाँ तक ले आया
मगर तुम्हें चाहना भी हमें बाधा लगा ।

यू ही लोग मुझे नही कहते है ‘हसीब’
मेरा नाम भी उन्हें कुछ आधा-आधा सा लगा।

:-हसीब अनवर

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