कविता · Reading time: 1 minute

🐚🐚सिंह सा लड़ता रहूँगा लक्ष्य को पाने की हद तक🐚🐚

सिंह सा लड़ता रहूँगा लक्ष्य को पाने की हद तक,
इस गगन को नत करूँगा, जान तन में है मेरे जब तक,
आदर्श का चोला पहनकर,लक्ष्य को मैं भेद दूँगा,
इस धरा पर पुनः फिर मैं वीर की हुँकार दूँगा।।1।।
वैरी को चीर दूँगा, अवरुद्ध जो पथ को करेगा,
सत्य का अनुशरण करूँगा, बल की जो सहतीर देगा,
शक्ति का संचार करके, लक्ष्य को मैं भेद दूँगा।
इस धरा पर पुनः फिर मैं वीर की हुँकार दूँगा।।2।।
कर्मभूमि में स्वबल से, पथ का मैं निर्माण करके,
पथ का पथिक बनकर, कठिनाइयों को चूर दूँगा,
स्व हृदय की आग से,लक्ष्य को मैं भेद दूँगा।
इस धरा पर पुनः फिर मैं वीर की हुँकार दूँगा।।3।।
उत्साह से स्वयं को भरकर, लक्ष्य को आसान करके,
ज्ञान की अग्नि से,जोश को मैं दृढ करूँगा,
बल के प्रबल वार से,लक्ष्य को मैं भेद दूँगा।
इस धरा पर पुनः फिर मैं वीर की हुँकार दूँगा।।4।।
विषम क्षण से खुद को सम्भाले, लक्ष्य कब का भेद जाता,
‘अभिषेक’ करके ही विजय से, लक्ष्य के प्रति शान्ति पाता,
शान्ति के उस रूप से,लक्ष्य को मैं स्वरुप दूँगा।
इस धरा पर पुनः फिर मैं वीर की हुँकार दूँगा।।5।।

###अभिषेक पाराशर###

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