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??बन्शी धुनि कबहुँ परेगी कान??

Abhishek Parashar

Abhishek Parashar

कविता

October 12, 2017

बन्शी धुनि कबहुँ परेगी कान,
भ्रमर गूँज सुनिबे में आवे, ताते बडहिं न मान,
योग न बनहिं न भजन बनावहिं कैसेहुँ धरहुँ जापे सान,
क्षण-क्षण बीते भारी विपति में, काज हुँ बनहि न लान,
एकहुँ काज न बनहि गोसाई निकरि जात अब प्रान,
ध्यान धरंहुँ हनुमत प्रभु तुम्हरो, छेड़ि देउ अब तान,
काज सवारहुँ एकहि बार में स्वर्ण वरन हनुमान,
‘अभिषेक’ पड़ो दुआर तिहारे, अंजनि सुत बलवान ।।

***अभिषेक पाराशर***

Author
Abhishek Parashar
शिक्षा-स्नातकोत्तर (इतिहास), सिस्टम मैनेजर कार्यालय-प्रवर अधीक्षक डाकघर मथुरा मण्डल, मथुरा, हनुमत सिद्ध परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से कविता करना आ गया, इसमें कुछ भी विशेष नहीं, क्यों कि सिद्धों के संग से ऐसी सामान्य गुण विकसित हो जाते है।... Read more
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