कविता · Reading time: 1 minute

【【{{मैं और मेरे दर्द}}】】

चल रात को सोने दे हम चाँदनी से बात करते है,
उम्र गुजर गई एक साथ के इंताजर में अकेले
कहाँ दिन कटते है.

उस तन्हाई में बेफिक्र बैठे हैं जहां पर तारे भी आराम करते है,दुनिया की भीड़ में तो सारे ही बदनाम करते हैं।

जरूरी नही दर्द किसी इंसान से ही बांटा जाए,
कभी कभी दीवारों से भी गम सांझा करते हैं।

हर कोना, हर रस्ता हर मोड़ साथ देता है तन्हा सफर में,
घर में तो अपने भी दगा करते हैं।

अलग ही मज़ा है अकेले में आँसू बहाने का,
ये अँधेरे फिर कितनी होंसला अफजाई करते है।

कितने भी ज़ख़्म दे रखे हो ज़माने ने,
ये मेरे कलम के नाखून सबकी भरपाई करते हैं।

दुनिया महसूस करती है जोर मेरे हुनर का,
हर शाम किताबों पर जब मैं और मेरे दर्द लिखाई करते हैं।

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