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✍✍मेरा विद्यालय-शिक्षा का बदलता स्वरुप ✍✍

Abhishek Parashar

Abhishek Parashar

कविता

October 31, 2017

साम नाद का वह स्वर जो अरण्य से कानों में आता था,
तत्व ज्ञान विज्ञान की शिक्षा को जो हमको सिखलाता था,
ऐसी बहुमुखी शिक्षा का हमने क्यों कत्ल भला कर डाला ?
आह! निकलती इस मन से हमने यह विष प्याला क्यों पी डाला ? ।।1।।
विद्या की प्रथम पाठशाला जीजा बाई की याद करातीं थीं,
प्रेरित होकर माताएँ बच्चों को गीता पाठ करातीं थीं,
इस शाला का रूप बदलकर कत्ल भला क्यों कर डाला ?
आह! निकलती इस मन से हमने यह विष प्याला क्यों पी डाला ? ।।2।।
बहुरंगी शिक्षाओं का आयाम हमारा विद्यालय था,
सभ्य समाज बनेगा कैसे मुख्य स्रोत विद्यालय था,
विद्या के आलय का कत्ल भला हमने क्यों कर डाला?
आह! निकलती इस मन से हमने यह विष प्याला क्यों पी डाला ? ।।3।।
ऋषि मुनि जो तप अर्जित कर बल का संयम रखते थे,
देकर शिक्षा परमारथ की त्याग सरिस जीवन जीते थे,
पश्चिम की शिक्षा अपना कर, स्वयं का कत्ल भला क्यों कर डाला ?
आह! निकलती इस मन से हमने यह विष प्याला क्यों पी डाला? ।।4।।
दारुण उपजा मन में मेरे, भोगवाद की शिक्षा को लेकर,
मानव भटका अपने तल से विकृत सी शिक्षा को लेकर,
पुण्यमयी भागीरथी सी शिक्षा का हमने कत्ल भला क्यों कर डाला?
आह! निकलती इस मन से हमने यह विष प्याला क्यों पी डाला? ।।5।।
अभी समय है साफ करें हम शिक्षा के इस दर्पण को,
प्रखर बनाती जो अपनी संस्कृति के रूप और यौवन को,
नव चिन्तन से ध्यान हटाकर अपना कत्ल भला क्यों कर डाला ?
आह! निकलती इस मन से हमने यह विष प्याला क्यों पी डाला? ।।6।।

###अभिषेक पाराशर###

Author
Abhishek Parashar
शिक्षा-स्नातकोत्तर (इतिहास), सिस्टम मैनेजर कार्यालय-प्रवर अधीक्षक डाकघर मथुरा मण्डल, मथुरा, हनुमत सिद्ध परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से कविता करना आ गया, इसमें कुछ भी विशेष नहीं, क्यों कि सिद्धों के संग से ऐसी सामान्य गुण विकसित हो जाते है।... Read more
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