⛈⛈⛈दामिनी गिरी नीम वृक्ष पर जब⛈⛈⛈

भीषण कोलाहल हुआ गगन में, जब घिरी घनघोर घटायें।
दामिनी गिरी नीम वृक्ष पर जब, वह मानष का जोश घटायें।
हुआ कोलाहल दामिनी का, जब दसों दिशायें डोल उठी थीं।
नव कलत्र भी अपने पति से, कुछ भय का सा बोल उठीं थी।
भय था ध्वनि का, जिसको अति समीप से सुना उन्होंने।
भय था तेज पुन्ज का, जिसको अति समीप से देखा उन्होंने।
हुआ प्रकाशमय धरा का तल, छर-छर छर की कूक उठी थी।
बालक तन की कोमल उंगली, माँ का आँचल खोज उठी थी।
अचरज था लोगों को, एक क्षण में हुआ यह क्या आसमान में।
पाप दण्ड था या पुण्य अवतरण,न पाया कुछ बयान में।
नव युवकों की बुद्धि भ्रमित हुई, कुछ पल के लिए ठहर उठी थी।
हुआ वातावरण ससदम सा, पर बूँदों की ध्वनि बोल उठी थी।
क्या जलाकर राख करेंगी,दामिनी की वह टेढ़ी ज्वालायें।
मानष मन था ठहर गया वह, ज्यों ठहराती सुन्दर बालायें।
हुआ बधिर मानव एक क्षण,जब दामिनी वह तड़क उठी थी।
पशु पक्षी भयभीत हुए थे, पर उनकी ध्वनि बोल उठी थी।
##अभिषेक पाराशर(9411931822)

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आदर्श वाक्य है- "स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:", "तेरे थपे उथपे न महेश, थपे...
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