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⛈⛈⛈दामिनी गिरी नीम वृक्ष पर जब⛈⛈⛈

Abhishek Parashar

Abhishek Parashar

कविता

July 30, 2017

भीषण कोलाहल हुआ गगन में, जब घिरी घनघोर घटायें।
दामिनी गिरी नीम वृक्ष पर जब, वह मानष का जोश घटायें।
हुआ कोलाहल दामिनी का, जब दसों दिशायें डोल उठी थीं।
नव कलत्र भी अपने पति से, कुछ भय का सा बोल उठीं थी।
भय था ध्वनि का, जिसको अति समीप से सुना उन्होंने।
भय था तेज पुन्ज का, जिसको अति समीप से देखा उन्होंने।
हुआ प्रकाशमय धरा का तल, छर-छर छर की कूक उठी थी।
बालक तन की कोमल उंगली, माँ का आँचल खोज उठी थी।
अचरज था लोगों को, एक क्षण में हुआ यह क्या आसमान में।
पाप दण्ड था या पुण्य अवतरण,न पाया कुछ बयान में।
नव युवकों की बुद्धि भ्रमित हुई, कुछ पल के लिए ठहर उठी थी।
हुआ वातावरण ससदम सा, पर बूँदों की ध्वनि बोल उठी थी।
क्या जलाकर राख करेंगी,दामिनी की वह टेढ़ी ज्वालायें।
मानष मन था ठहर गया वह, ज्यों ठहराती सुन्दर बालायें।
हुआ बधिर मानव एक क्षण,जब दामिनी वह तड़क उठी थी।
पशु पक्षी भयभीत हुए थे, पर उनकी ध्वनि बोल उठी थी।
##अभिषेक पाराशर(9411931822)

Author
Abhishek Parashar
शिक्षा-स्नातकोत्तर (इतिहास), सिस्टम मैनेजर कार्यालय-प्रवर अधीक्षक डाकघर मथुरा मण्डल, मथुरा, हनुमत सिद्ध परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से कविता करना आ गया, इसमें कुछ भी विशेष नहीं, क्यों कि सिद्धों के संग से ऐसी सामान्य गुण विकसित हो जाते है।... Read more
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