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⛅ हमारी रंगीन दुनिया ☔

दिनेश एल०

दिनेश एल० "जैहिंद"

कविता

May 31, 2017

⛅ हमारी रंगीन दुनिया ☔
?दिनेश एल० “जैहिंद”

श्वेत बादलों के आगोश में चाँद दिखा है ।
आभास होता कि सीप में मोती छिपा है ।।
चित्र की बनावट है प्रकृति के नमूने जैसा ।
कोई तूलिका भी न खींच पाए चित्र ऐसा ।।

मेघ-जल-चाँद मिलकर हमें भरमाते हैं ।
बड़ी विचित्र खुले मुख की छबि बनाते हैं ।।
सत् से मिल परछाई क्या रूप सजाती है ।
चाँद से लेकर रोशनी मोती बन जाती है ।।

है ऐसी ही द्विअर्थी हमारी रंगीन दुनिया ।
जहाँ होते एक-से-एक बढ़कर बड़े गुनिया ।।
शराफ़त के चोले में होते ज़हर की पुड़िया ।
मान बेच कर नारी का मौज करे रसिया ।।

वाणी बोले कोयल की काक जैसा मन है ।
हृदय में तो मैल बैठा गोरा-गोरा तन है ।।
मुख पर मुस्कान बड़ी मन में उलझन है ।
दिल में रखे यार की छबि ऐसी दुल्हन है ।।

एक तरफ राम-राम दूजी ओर ध्यान है ।
पाठ पढ़ाए बच्चों को और कहीं कान हैं ।।
गीता पर हाथ मगर सब झूठे बयान है ।
जाने सबकुछ पुलिस फिर भी अंजान है ।।

ख़ाकी वर्दी में पुलिस हमें चूस रही है ।
ठगनी भी हमें साध्वी बन लूट रही है ।।
ख़ादी वेश में भी हमें नेता मूढ़ रहे हैं ।
सारे वकील भी बोल यहाँ झूठ रहे हैं ।।

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दिनेश एल० “जैहिंद”
18. 05. 2017

Author
दिनेश एल०
मैं (दिनेश एल० "जैहिंद") ग्राम- जैथर, डाक - मशरक, जिला- छपरा (बिहार) का निवासी हूँ | मेरी शिक्षा-दीक्षा पश्चिम बंगाल में हुई है | विद्यार्थी-जीवन से ही साहित्य में रूचि होने के कारण आगे चलकर साहित्य-लेखन काे अपने जीवन का... Read more
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