★बेपरवाह नदी★

★बेपरवाह नदी★
मुक्त हूँ,
उन्मुक्त हूँ मैं,
स्वछन्द हूँ, स्वतंत्र हूँ मैं,
वो अक्सर बड़बड़ाती है।
परिदों सा परवाज़ चाहती है,
पर वो भी असीम कहां?
उसकी ये बेतरतीब बातें,
जब भी सुनता हूँ,
बस एक ही चित्र उभरता है मन में,
“बेपरवाह नदी”
रिसकर, बर्फ को घिसकर,
लेकर खुद को, उतुंग शिखर से,
उछल जाती है,
निर्भीक, निडर, निश्छल,
अबोध शावक की भाँति,
चोट खाती है,
उठकर, भागती है,
ऊँचे-ऊँचे पहाड़ो के बीच से,
और तेज भागती है,
तोड़ते, मोड़ते, मुड़ते हुए,
बढ़ती जाती है,
किनारों की परवाह ही किसे है।
समतल में आकर,
ज़रा सुस्ताने लगती है,
लगता है उन बाधाओं को चिढ़ा रही हो,
या हमें समझा रही हो,
कि बाधायें वेग बढ़ा देती है, शायद।
पर अब वो खुद से ही,
खुद के किनारें बनाती है,
और उनके बीच अविरल,
उद्देश्य-प्रवण प्रवाहित होती है,
निरंतर, निर्बाध,
परंतु ये किनारे,
निर्देशित प्रवाह हेतु है,
रुकावट नही,
मर्यादा की ढोंगी दीवार नही।
जब भी ये किनारें बाधक बनते है,
नदी एक झटके में मिटा देती है,
उनका वजूद और नए मूल्यों,
नये किनारों को गढ़ती है,
जो उद्देश्य, प्रवाह और वेग के,
बाधक न बने।
कई नदी हमारे आसपास भी है,
उन्हें उन्मुक्त बहनें दे।
उन्हें सागर रचने दें।
उन्हें सागर रचने दें।।
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©सौरभ सतर्ष
#अभय_अनंत_अवनि_अम्बर

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