कविता · Reading time: 1 minute

●◆दर्द का हिसाब◆●

दर्द का मेरे कोई हिसाब नही लगाता
बुरे वक़्त में मेरे कोई पास नही आता।

दूर से निकल जाते हैं राम-राम करके
नज़दीक से कोईभी हाँथ नही मिलाता।

चमक जबतक थीमेरे घरकी दीवारों में
गैर भी अपनों सा आवाज़ था लगाता।

दोस्त भी आते और दुश्मन भी आता
जलता चिराग़ देख हर कोई बुलाता।

के लुटी जब खुशियों की दुनिया हमारी
लेना हमारी हर कोई ख़बर भूल जाता।

दिवाली हो चाहे हो फिर रंगों की होली
आकर मोहल्ला पूरा मेरे घर मनाता।

अपने भी आते साथ पराये भी लाते
मिल बांट सब एक थाली में खाते।

के जब से लगा हमको दुःख का तमाचा
नजरें फिराकर हर कोई निकल जाता।

मुश्किल में अब हमारेकोई काम नआता
न शहर नजर आता न गाँव नजर आता।

उखड़े हैं जब से हसी दिनों के दरख़्त
तिनके साहरकोई हमारीऔक़ात लगाता

जबतक रहे हमारे पुराने दिन वो सुहाने
बनाते रहे लोग हमारे दिलों में ठिकाने।

जैसे ही देखा हमारी ओर भूचाल आता
भागा मतलबी अपनाकोरा दामन बचाता

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