●•देखो तो उन्हें •●

देखो तो उन्हें, वो कितना कह रहे
हमने कुछ कहा, तो शायद ज्यादा कह दिया
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जश्न में वो और महदूद में हम रहे
उन्होंने जो खींची, उन लकींरो को मिटा दिया
ये कोशिश, हमने खौफ नजरों को हाँ करके की
इसे ओहदा क्या कहा, तो शायद ज्यादा कह दिया
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उनके कहने का वो असर, मुझे चोट में कायम है
वो असर मेरी हस्ती, मेरी तबीयत का बहाना बन गया
क्या सहे हम और चुप रहने की वजह क्या थी?
मेरा ये लफ्ज़ गुनेहगार हुआ, तो शायद ज्यादा कह दिया
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क्यों ताने मुझ पर, इस तरह से गिरने लगे
कि बिजुरी भी ये कही, देखो, वो मेरा हिस्सा गिर गया
गरज भला हो कैसे? जब घोर शान्त है मेरी घुटन में
रात में रात का मंजर कहा, तो शायद ज्यादा कह दिया
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तरस हो दिल पर या घाव पर पत्थर, में फर्क बस इतना देखा है
कोई पुछे तो बयां हाले जी, न पुछे तो हाल का नकाब बन गया
देखो तो उन्हें, वो अपने ढंग पर गुरुर कर रहे
हमने ये भी कहा, तो शायद ज्यादा कह दिया
– शिवम राव मणि

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एक दौर जो गुज़र गया मगर ज़िन्दा है, वक्त के निशान कोई मिटा नहीं जाता
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