Jul 20, 2020
कविता · Reading time: 1 minute

◆{{ ◆ पाव की बेड़ी ◆}}◆

मैं ओस की बूंद सी पारदर्शी ,
तेरे वज़ूद पे गिरी, और तुम में समा गई,,

तेरी फ़ितरत पतंगे सी , उड़ने वाली,
जिस फूल पे टिकी, उसी पे रह गई ,,

बहुत चाहा तुझे छुपा लू, सब की नज़रों से,
मेरी यही आदत ,तुझे हर बार खल गई,,

न समझ पाया तू ,मेरे निश्च्छल प्रेम को,
मेरा हर अनुबन्ध , तुझे बन्धन लग गई,,

मेरी निगाह जब उठी, एक तेरी ही छवि देखी,
क्यों मेरी उमड़ी साँसे , तुझे आहें लग गई,,

तेरे दिल को जो भा जाए, वो अदाएं नही मुझमे,
क्यों मेरी सादगी , तुझे बनावटी लग गई,,

बखूबी जानता हैं ,, मेरी हर मन्नत हैं तू,
क्यों मेरे मन्नत के धागे, तुझे पावँ की बेड़ी लग गई,,

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