।।मरहम नहीं।।

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तू फलक का है खुदा तो हम जमीं पर कम नहीं।
वस्ल की हो रात कैसे गर जमीं पर हम नहीं।।
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हम नहीं तो इश्क की हर इक गली सुनसान है।
हम सजा दें जिस गली को उस गली फिर गम नहीं।।
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है बहुत तूफान पाले बादलों के झुण्ड ये।
बूँद आँसू सी, गिरा दे बादलों में दम नहीं।।
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चाँद तन्हा रात में अब…. चाहता आगोश बस।
बेकरारी ये मिटा दे …है कहीं जानम नहीं।।
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है दवा हर जख्म की बहते समय की धार में ।
जख्म दे दे हम वो भर ले है कहीं मरहम नहीं।।
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धड़कनें लेकर जवाँ अब बढ़ चली सरिता कहाँ।
थम नहीं सकती, मिलेगा जब तलक हमदम नहीं।।
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दे गवाही खंडहर औ पेड़ तन कर जो खड़े।
हम नहीं हों तो फ़िजां में बज सके सरगम नहीं।।
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संतोष बरमैया #जय

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