कविता · Reading time: 2 minutes

।।आया सावन झूम के।।

हर वर्ष की भांति
इस वर्ष भी,
आया सावन झूम के।
चेहरे पे आई नई ताजगी।
जब पहली वारिश की
पहली बूंदें गिरीं जमीं पे,
मेरे चेहरे को चूम के।
हर वर्ष की भांति
इस वर्ष भी ,
आया सावन झूम के।

त्रिण-त्रिण खिल उठा,
हरियाली धरा पे छाने लगी।
पुष्पवाटिका में जब पुष्पों ने ली अंगडा़ई ,
दिल ये बाग-बाग होने लगा।
मंत्रमुग्ध मन खाने लगा।
भौंरे भी गुनगुनाने लगे,
तितलियां भी फुदकने लगींं।
आने लगी हवाओं में सुरसुरी,
खिंजां भी ये गुलजा़र होने लगी।
मेढकों के टरटराहटों के वीच
कोयल भी मधूर गीत गाने लगी।
माहौल खुशनूमा सा हो गया।
दिल में मस्तीयां सी छाने लगी।
तन ये नाचा,आज मन ये नाचा
गांव की पगडंडियों में घुम के।
हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी,
आया सावन झूम के।

शाम ये ढल चुकी,
रात का जो आगाज़ हुआ।
ऐसा लगा धरा पे सिर्फ
मेघराज का राज़ हुआ।
कारी बदरी – घनघोर घटा।
चारो तरफ बिखरींं अंधकारी छटा।
भिग सी गई मेरी बालों की लटा।
मन ये बोला ,
अब हौले हौले हटा सावन की घटा।
नीले आसमान में चांद का दीदार जो
करना है मुझे।
उससे प्यार जो करना है मुझे।
वारिशें अब थम चुकी थीं।
काले बादल छंट रहे थे,
टुकडों में ये बंट रहे थे।
सितारों के वीच मेंं चांद नजर आ रहा था।
नम्-नम् आंखोंं से चांद को निहार रहा था।
क्या हसीं नजा़रा था,
पहली दफा प्रकृति पे
इसकदर दिल आया था।
प्रकृति की गोद मेंं आज सारा जंहां था।
प्रकृति भी इठला रही थी
आज जीवों के मधूर ध्वनी को सुन के।
हर वर्ष की भांति
इस वर्ष भी ।
आया सावन झूम के।
आया सावन झूम के।।

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स्वरचित् कवि,गीतकार,संगीतकार व गायक
Nagendra Nath Mahto(N N MAHTO)
धन्यवाद् !
Copyrights :- Nagendra Nath Mahto

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