गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

फ़ासला रह गया

मिट ने वाला था जो फ़ासला रह गया
खेल किस्मत का मैं देखता रह गया

कुछ कहे बिन मुझे चल दिया छोड़कर
बिन लुटे यार मैं ख़ाक सा रह गया

जब दिया बुझ गया पास आया कोई
रौशनी में उसे ढूँढ़ता रह गया

देर इन्साफ़ को हो रही आज है
इस भी तारीख़ पर फ़ैसला रह गया

क़द्र इन्सान की कर सका कब कोई
कोई पत्थर मगर पूजता रह गया

ज़ुल्म होता रहा आँख के सामने
ये ज़माना मगर देखता रह गया

जान निकली किसी की मेरे सामने
जिस्म लरजा मेरा कांपता रह गया

जिसको सोचा नहीं वो मिला है सदा
जिसको चाहा मगर वो जुदा रह गया

जबकि ‘आनन्द’ ने माफ़ियां मांग लीं
कौन सी फिर शिकायत गिला रह गया

– डॉ आनन्द किशोर

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