ज़िन्दगी

जिन्दगी जलने लगी है इन सुखों की छांव में।
चैन ओ अमन तो आये अपने बूढ़े गांव में।।

शहर में सुख सब मिले पर मन परेशां ही रहा।
गांव में ग़म तो थे लेकिन जैसे पानी नाव में।।

हमने वफ़ा के नाम पर बस सीख ली आवारगी ।
कौन कब आकर फंसे रहते थे बस इस दांव में।।

कर गुजरना अपनी फितरत थी तो सब करते रहे।
काम अच्छे या बुरे आकर के झूठे ताव में।

हम सुधरने से लगे हैं आजकल कुछ रोज से।
कोई सांकल रोकती है पांव बांधे पांव में।।

विजय बेशर्म गाडरवारा
9424750038

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