गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी भी अब चाय की प्याली सी है,
चुस्कियां लेते लेते ये थोड़ी खाली सी है,

वक़्त के साथ ठंडे होते गर्म अहसास,
शक्ल-ओ-सूरत भी ज़रा काली सी है,

लज़्ज़त है की जाती ही नहीं इसकी,
तबियत में अलबत्ता ये रुमाली सी है,

मेहनत-ओ- मुहब्बत भी थकने लगी,
बदले में मिली नाकाफी हमाली सी है,

कब शुरू हुई और कब ख़तम हुई,
सिमटी हुई गरीब की बदहाली सी है,

उबलती ही रही पकने की खातिर,
मुर्शिद के दर पे खड़ी सवाली सी है,

‘दक्ष’ ऐबों में शुमार कर लो इनको,
ख्वाइशों में दिल की तंगहाली सी है,

विकास शर्मा ‘दक्ष’

लज्ज़त = आनंद ; रुमाली = नर्म सी ; हमाली = मजदूरी / वेतन ; मुर्शिद = गुरु ; सवाली = प्रश्न करने वाला / जिज्ञासु ; शुमार =गणना ; तंगहाली = तंग हाल में

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