कविता · Reading time: 1 minute

ज़िन्दगी…..

ज़िन्दगी फिर से एक फसाना ढूंढती है ।
पास आने का बहाना ढूंढती है ।।
मौत कब से खड़ी है, दरवाज़े पर ।
और ये है की, ना जाने का बहाना ढूढती है।।
गुज़र गये वो पल, जो थे खुशी के ।
ये पगली ….आज भी वही प्यारा सा तराना ढूंढती है।।
मौत कब से खड़ी है, दरवाज़े पर ।
और ये अब, जीने का बहाना ढूढती है।।
:- सैयय्द आकिब ज़मील (कैश)

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