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ज़िन्दगी हमको बिताना आ गया

ज़िन्दगी हमको बिताना आ गया
रोते रोते मुस्कुराना आ गया

ज़ख्म देने में लगे इंसान सब
आजकल कैसा ज़माना आ गया

माँ मिली जो घर के बाँटे में हमें
झोली में हर इक खज़ाना आ गया

डर नहीं लगता किसी से अब हमें
आँख सूरज को दिखाना आ गया

दाँव सारे सीख दुनिया के लिए
हमको भी रिश्तें निभाना आ गया

याद के साए लिपट हमसे गए
मोड़ जैसे ही पुराना आ गया

माही
अमरसर, जयपुर

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Mahesh Kumar Kuldeep
Mahesh Kumar Kuldeep "Mahi"
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प्रकाशन साहित्यिक गतिविधियाँ एवं सम्मान – अनेकानेक पत्र-पत्रिकाओं में आपकी गज़ल, कवितायें आदि का प्रकाशन... View full profile
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