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ज़िन्दगी एक सवाल

Bhupendra Rawat

Bhupendra Rawat

कविता

February 11, 2017

ज़िन्दगी एक सवाल बन जाती है
हर कदम पर एक इम्तहाँ बन जाती है
लावारिस लाश सी है ज़िन्दगी
जितना कोशिश करो सुलझाने की
उतनी और उलझती जाती है।
आइना भी धुंधला हो जाता है,समय के साथ
शक्ल में भी धुंधली काई सी चढ़ जाती है।
मश्क्कत करनी पड़ती है, अक्सर
खुद को सवांरने में,बेइंतहा
ज़िन्दगी भी कम पड़ जाती है
लगा रहता हूँ,दूसरों को मनाने की कोशिश में अक्सर
ज़िन्दगी भी खुद से दूर होती सी नझर आती है।
बैठ जाता हूं अक्सर, थककर
आशियाने में चंद सुकूँ की तलाश में। लेकिन
घिरा पाता हूं, खुद को ज़िन्दगी के जंजाल में।
जहां जब चाहे हँस लिया करते थे ,कभी बेवजह
आज ज़िन्दगी भी अब हंसने के अवसर और
बहाने ढूंढती नझर आती है।
बिक जाती है ज़िन्दगी अक्सर
इम्तिहानों में , खुद को साबित करते करते
अब रूह भी घुट घुट कर मरती जाती है।

भूपेन्द्र रावत
10।01।2017

Author
Bhupendra Rawat
M.a, B.ed शौकीन- लिखना, पढ़ना हर्फ़ों से खेलने की आदत हो गयी है पन्नो को जज़बातों की स्याही से रँगने की अब बगावत हो गईं है ।
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