Apr 20, 2020 · कविता

ज़िंदगी

खुद को कुछ मोहलत तो दे कर देखते,
ज़िन्दगी कुछ और जी कर देखते…
मौत किस मसले का हल है,
ज़िन्दगी बन कर कभी तुम देखते..
ग़ुम हो गए लेकर निशां तुम ख़ाक में,
खुद का पता लेकर कभी तुम देखते..
किस का गया कुछ साथ तेरे?
बस ज़िक्र तेरा रह गया..
खुद को कभी दिल से लगा के,
तुम मुस्कुरा कर देखते..
खुद को कुछ मोहलत तो दे कर देखते,
ज़िन्दगी कुछ और जी कर देखते…

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Urdu and hindi poetry writer Books: Non
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