ज़मीर

ये क्या हो रहा है हैव़ानियत की इंत़ेहा हो गई है।
इंसानिय़त सिस़क रही है।
जिंदगी श़र्मसार होकर ख़ौफ से दुब़क कर रह गई है ।
ना जाने कब जागेगा ज़मीर इंसानों का जो हैव़ानियत के खिलाफ़ उठ खड़ा हो ।
और मिटा सके इन हैव़ानों का वज़ूद ।
जो बचा सके इंसानिय़त को और श़र्मसार होने से पहले ।

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