ज़माने भर को मेरा सर,,,

ज़माने भर को मेरा सर दिखाई देता है,
हर इक हाथ में पत्थर दिखाई देता है,

वो एक चाँद कई दिन से जो गहन में रहा,
कभी कभार वो छत पर दिखाई देता है,

में अपने बाज़ू से इसको भी नाप सकता हूँ,
ये सामने जो समंदर दिखाई देता है,

मेरे कबीले में रहने के तुम नहीं काबिल,
तुम्हारे दिल में बहुत डर दिखाई देता है,

जहाँ से हो गयी हिजरत हमारी बचपन में,
हमारे ख्वाब में वो घर दिखाई देता है,

मेरे लहू की है तासीर मेरे शेरो में,
तभी ग़ज़ल में वो तेवर दिखाई देता है,

———अशफ़ाक़ रशीद,

Like Comment 0
Views 6

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share