ज़माना कह रहा अच्छा हुआ है

ज़माना कह रहा अच्छा हुआ है
मिरे दिल का मगर सौदा हुआ है

पहुंचना पार था जिसको कभी का
किनारे पर वही बैठा हुआ है

जिसे सोचा के शायद नाख़ुदा ये
उसी का मुंह मगर लटका हुआ है

बनाया जिसको सबने रहनुमा था
लुटेरा बन के वो आया हुआ है

उसी ने मुंह न देखा जिसका वो था
मनाऊँ क्या ख़ुशी बेटा हुआ है

तमाशा देखकर के ज़िन्दगी का
मिरा मन क्यों बहुत उलझा हुआ है

फ़क़त देखा नज़र भरकर किसी को
तभी से दिल मेरा बहका हुआ है

हुयी ताबीर मेरे ख़्वाब की जब
लगा मुझको मेरा देखा हुआ है

वो आएंगे अभी आते ही होंगे
न जाने वक़्त क्यों ठहरा हुआ है

मुहब्बत से सजा दो इस चमन को
मिरे दिल का यही फ़तवा हुआ है

मनाना है तो करनी काविशें भी
मेरा ‘आनन्द’ कुछ रूठा हुआ है

स्वरचित
डॉ आनन्द किशोर

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