गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

ग़ज़ल

प्यार से माँ की वो’ लोरी गुन्गुनानी फिर कहाँ
राज कन्या राज रानी की कहानी फिर कहाँ ?

तुम ही’ लायी थी बहारें जिंदगी में दिलरुबा
तुम चली जब से गयी, वो जिन्दगानी फिर कहाँ ?

कुर्सी’ सबको चाहिए पर देश रक्षा के लिए
सर कटाने देश प्रेमी, स्वाभिमानी फिर कहाँ ?

क्या वे’ दिन थे यार, करते मौज मस्ती साथ में
मिलते’ सब अब भी वहीँ, पर मेजवानी फिर कहाँ ?

वक्त ने जो ज़ुल्म ढाया, जिंदगी तो बच गई
इस पुराने खण्डहर में, वो रवानी फिर कहाँ ?

एक बार और आगे’ हम यह जीस्त जीना चाहते
ये अगर मिल भी गई. तो वह जवानी फिर कहाँ ?

बाढ़ ने जब कूल तोड़ा, तब नदी तो मिट गई
जिंदगी ही जब नहीं तो, अब निशानी फिर कहाँ ?

इक थी रानी झांसी’ हिम्मत से लड़ाई की सदा
ढूंढ लो इतिहास, देखो वैसी’ रानी फिर कहाँ |

दोस्ती की बात करते, किन्तु खंजर हाथ में
बारहा ‘काली’ कहे यह बेइमानी फिर कहाँ |

कालीपद ‘प्रसाद’

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