गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

ग़ज़ल

तारीफ़ क्या करूँ तेरी आखों की नूर की
देदिप्त अंग अंग है’ सुरलोक हूर की |

वो नूर और ओज, सभी दिव्य देव के
राजा या’ रंक चाह है’ दैविक जुहूर की |

अभियान-स्वच्छता चली’ हर गाँव शह्र अब
आखें तलाशती सदा’ कूड़े की’ घूर की |

जो भी हुआ यहाँ सभी’ अल्लाह ही मेहरबाँ
सज़दा करूँ सदैव दयालू गफूर की |

जानम ज़रा पिलाना’ मुझे अपने’ हाथ से
दस्तूर, मय पियो तो’ शराबे तुहूर की |

गुंडे कसूरवार सभी बच निकलते’ है.
सुनते कहाँ यहाँ कोई अब बेकसूर की |

शिशु कृष्ण के चिकूर मनोहर हसींन हैं
गोकुल, गोपियाँ हैं’ दिवानी चिकूर की |

ये वक्त की नज़ाकतें, रकीबों से दोस्ती
‘काली’! दुआ क़ुबूल, इनायत हुज़ूर की |

गफूर =भगवान
जुहूर = तेज; शराबे तुहूर=स्वर्ग की मदिरा

कालीपद ‘प्रसाद’

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