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ग़ज़ल

kalipad prasad

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गज़ल/गीतिका

November 13, 2017

तुम नहीं सुनते कहानी मेरी
हो रही बंजर जवानी मेरी |

क्या कहे तुमको जबानी मेरी
खत्म अब सब वो रवानी मेरी |

धीरे’ धीरे बह गया पानी सब
रह गयी केवल निशानी मेरी |

क्या कहूँ तुमको, कहा जब भी कुछ
झूठ माना सब बयानी मेरी |

आशिका की तो नहीं थी किल्लत
दर्ज़नों में थी दिवानी मेरी |

प्रेम में तेरे हुआ था पागल
थी यही तो एक शेखी मदानी मेरी |

रोते’रोते सुख गया आँसूं सब
देख तू ‘काली’ फ़िशानी मेरी |

शब्दार्थ : मदानी=मुर्खता
फ़िशानी=रक्तिम आँसूं

कालीपद ‘प्रसाद

Author
kalipad prasad
स्वांत सुखाय लिख्ता हूँ |दिल के आकाश में जब भाव, भावना, विचारों के बादल गरजने लगते हैं तो कागज पर तुकांत, अतुकांत कविता ,दोहे , ग़ज़ल , मुक्तक , हाइकू, तांका, लघु कथा, कहानी और कभी कभी उपन्यास के रूप... Read more
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