ग़ज़ल

मतला से शुरुआत ….
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क्यूँ लहजा तेरा शायराना नहीं है
लिखी क्यों ग़ज़ल जो सुनाना नहीं है

बहुत प्यार मुझको मिला वालिदा का
मुझे प्यार को यूँ गंवाना नहीं है

हुई है मोहब्बत बताएं भी कैसे
अजी मौका ये आशिकाना नहीं है

हरिक बात पर तुम दिखाते हो नखरे
रुलाते हो क्यूँ जब मनाना नहीं है

तिजारत बनी है हमारी मोहबबत
मेरी ही तरफ तो निशाना नहीं है

मेरी दिल्लगी को शरारत समझना
मेरा काम उनको रिझाना नहीं है

ज़रा देर तो तुम यहाँ पास बैठो
नहीं बैठने का बहाना नहीं है

तुम्हारे सिवा मैं कहाँ जाऊं मौला
जहाँ में कहीं भी ठिकाना नहीं है

मक्ता ….

हुई है मोहब्बत मुझे तुम से ‘आभा’
यही बात तुमको बताना नहीं है
….आभा

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