गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

ग़ज़ल

कुछ को लगा कि नाव डूबता नज़र आ रहा है
तो कोई अपनी सत्यता का गीत गाता रहा है |

तो कोई माँगता है हक़ तमाम संपत्ति स्वामित्व
फिर इंदिरा को याद कर प्रशस्ति गाता रहा है |

दिन भर खड़े खड़े हताश लोग सब हैं परेशां
कुछ नोट वास्ते तमाम दिन ही प्यासा रहा है |

आशा कभी रही नहीं कि अच्छे दिन गप्प होगा
चेहरा सभी कुसुम कली निराश मुरझा रहा है |

वादा बहुत हुआ प्रसाद कुछ मिला भी नहीं अब
मुँह अब झुका झुका इधर उधर छिपाता रहा है |

© कालीपद ‘प्रसाद’

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स्वांत सुखाय लिख्ता हूँ |दिल के आकाश में जब भाव, भावना, विचारों के बादल गरजने लगते हैं तो कागज पर तुकांत, अतुकांत कविता ,दोहे , ग़ज़ल , मुक्तक , हाइकू,…
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