ग़ज़ल

गजल :

दूरी इतनी ठीक नहीं है कुछ तो साथ निभाओ
चार कदम आगे आया, तुम एक कदम तो आओ

टूटे पत्ते सा गिरता हूं कोई तो मुझको थामो
मिट्टी में मिल जाऊं इससे पहले हाथ बढ़ाओ

माना धूप बड़ी तीखी है छाया कहीं नही है
लेकिन ऐसा भी क्या थोड़ी दूर भी न चल पाओ

रीति रिवाजों की डोरी में रिश्ते जो बांधे हैं
उलझ गए हैं इतने इनको थोड़ा तो सुलझाओ

दो पाटों की तरह नदी के चलना भी क्या चलना
साथ अगर चलना है तो हाथो मे हाथ मिलाओ

खुशियों का क्या वो तो दौड़ी दौड़ी आ जायेंगी
पहले अपने मन की कुंठायें तो दूर भगाओ

—हेमन्त सक्सेना–

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