ज़मीं पर नीम जां यारी पड़ी है,

ज़मी पर नीमजाँ यारी पड़ी है।
इधर खंजर उधर आरी पड़ी है।।

मेरे ही सर प हैं इलज़ाम सारे।
बड़ी महँगी वफादारी पड़ी है।।

हज़ारो बार देखा आज़मा कर।
मुहब्बत हर दफ़ा भारी पड़ी है।।

अजब सा ख़ौफ़ फैला है वतन में।
हवा के हाथ चिंगारी पड़ी है।।

समन्दर से कोई रिश्ता है इसका।
नदी किस वास्ते खारी पड़ी है।।

नीमजां=घायल

—–//अशफ़ाक़ रशीद

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