Jul 16, 2016 · कविता
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ग़ज़ल

मुख्तसर से ही सही पर फासले’ रह जाएंगे ”
गर मिजाज़ों में अना के वसवसे’ रह जाएंगे।

इश्क़ जिस दिन पहुंचेगा यारो जुनूं की हद के पार”
बोलने वालों के उस दिन लब सिले’ रह जाएंगे।

हौसलों से हम करेंगे आसमां का अब तवाफ”
क़द बुलंदी वाले अपना नापते’ रह जाएंगे।

साथ मेरे चलने को उस दम वो होंगे बेक़रार”
मुख्तसर जब ज़िन्दगी के रास्ते’ रह जाएंगे।

बाद मरने के भी तेरी जुस्तजू में जानेमन”
ये दरीचे मेरी आँखों के खुले’ रह जाएंगे।

सारी दुनियां से खुलूस ए वाहमी मिट जाएगा”
हैं मरासिम जो भी मेरे आपके’ रह जाएंगे।

कर ले तू सिंगार मेरी चाहतों के साए में”
बा खुदा हैरत से तकते आईने’ रह जाएंगे।

कितनी होगी साक़िया रुस्वाई फिर तू सोंचले”
तेरे मैखाने में गर हम बिन पिये’ रह जाएंगे।

ग़ुल चराग़ ए ज़िन्दगी होजाएगा बेशक जमील”
बाम पर यादों की कुछ रोशन दिये’ रह जाएंगे।
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१’अना के वसवसे••घमंड भरे ख्याल।
२’ तवाफ••परिक्रमा।
३’मुख्तसर••थोड़ा/कम।
४’दरीचे••खिड़कियां।
५’खुलूसे वाहमी••आपसी मेल जोल।
६’मरासिम••दस्तूर।
७’ग़ुल चराग़••बुझा हुआ दिया।

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jameel saqlaini
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