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ग़ज़ल

kalipad prasad

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गज़ल/गीतिका

January 12, 2018

कभी तेरी भी’ चाहत हो, मिले आ जाये’ है मुझसे
नज़ाकत से उठे घूँघट, तू’ शर्मा जाये’ है मुझसे |

तकाज़ा-ए-निगह तेरी, पकड में हो मेरी जब भी
पशेमां और उलझन में, तू’ घबरा जाए’ है मुझसे |

रवैया संत के, सबको किया शर्मिन्दा’ दुनिया में
न तुमसे वो सुना जाए न बोला जाए’ है मुझसे |

समय को मैं कहूँ क्या और, ढाया वह कहर मुझ पर
फिसलना वय का दामन भी, छूटा जाए’ है मुझसे |

हवादिस टूटना अब तो, तहम्मुल कर नहीं सकते
फुगाँ-ओ-खूंचकाँ लाशें न देखा जाए’ है मुझसे |

ज़माना अब बहुत बदला, नहीं है वक्त नेकी का
न नकली बात, वो रिश्ते निभाया जाये’ है मुझसे |

नबर्दे इश्क ने “काली” किया ज़ख्मी अनोखा है
न कोई देख सकता, या दिखाया जाए’ है मुझसे |

शब्दार्थ : तकाज़ा-ए-निगह= देखने की इच्छा
पशेमाँ =लज्जा, लज्जित
हवादिस= दुर्घटना, तहम्मुल= सहन
फुगाँ= आर्तनाद, खूंचकाँ= रक्तरंजित
नबर्दे इश्क= इसक के संघर्ष

कालिपद ‘प्रसाद’

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स्वांत सुखाय लिख्ता हूँ |दिल के आकाश में जब भाव, भावना, विचारों के बादल गरजने लगते हैं तो कागज पर तुकांत, अतुकांत कविता ,दोहे , ग़ज़ल , मुक्तक , हाइकू, तांका, लघु कथा, कहानी और कभी कभी उपन्यास के रूप... Read more
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