ग़ज़ल

ग़ज़ल
उठाते काँधों पर बन्दूक गोली छूट जाती है,
रहें तैनात सीमा पर गृहस्थी छूट जाती है.

इज़ाज़त हो अगर मुझको मैं इक शेर कह डालूँ,
ग़ज़ल अब मैं लिखूं कैसे रुबाई छूट जाती है.

मेरी बीबी बहुत भोली नहीं है उसमें चालाकी,
न पकड़ो हाथ इसका तो ये पगली छूट जाती है.

ढलानें हिज्र की यारो कभी वापस नहीं आतीं,
ज़ुदाई होती ऐसी है रुलाई छूट जाती है.

नहीं सावन के झूले हैं नहीं है नीम का बिरवा,
नहीं पहले सी मस्ती है ख़ुशी भी छूट जाती है.

वो करता है बहाने और नहीं लाता दवाई भी,
सभी कुछ लाता वालिद की दवाई छूट जाती है.

बहुत ‘आभा’ को तरसाया रुलाया है बहुत तुमने,
तुम्हारे प्यार में ये जिंदगानी छूट जाती है.

…आभा

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