ग़ज़ल- हमें भी तो खज़ाने का ज़खीरा मिल गया होता

ग़ज़ल- हमें भी तो खज़ाने का ज़खीरा मिल गया होता
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हमें भी तो खज़ाने का ज़खीरा मिल गया होता
अगर जो बेईमानी का किया कुछ हौसला होता

वो मेरा हमसफर शायद नहीँ ऐसे खफा होता
कि होता पास जो पैसा नया ही सिलसिला होता

ग़रीबी के वजह से दब गई है जिन्दगी मेरी
ये वरना कामयाबी से न इतना फासला होता

अगर जिन्दा रहें अच्छा, मरें तो भी न हो मुश्किल
कि मुश्किल है, नहीं जब जिन्दगी का फैसला होता

सितमगर है मगर फिर भी मेरी यादों में रहता है
वो दिल को चोट देकर भी नहीं दिल से जुदा होता

हमारी जिन्दगी शायद नया रुख दे भी सकती थी
अगर ‘आकाश’ मुझको भी कोई तुमसा मिला होता

– आकाश महेशपुरी

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