ग़ज़ल- वो गुनाहों का एक साया था

ग़ज़ल- वो गुनाहों का एक साया था
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
वो गुनाहों का एक साया था
दाग दामन पे जो लगाया था
°°°
अक्ल पे जैसे पड़ गया परदा
एक ज़ालिम पे रहम आया था
°°°
भूल पायेगा वो मुझे कैसे
मुझको आँखों में जो बसाया था
°°°
जिसपे कुर्बान कर दिया खुद को
मैं उसी से फरेब खाया था
°°°
दूर रहता है आजकल मुझसे
जो कभी प्यार बन के छाया था
°°°
दिल अगर ये “आकाश” टूटा है
दोष तेरा है आजमाया था

– आकाश महेशपुरी

Like 1 Comment 0
Views 153

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share
Sahityapedia Publishing