ग़ज़ल- बहुत पिसती जवानी हर तरफ है

ग़ज़ल- रोती कहानी हर तरफ है
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यहाँ रोती कहानी हर तरफ है
बड़ी लगती वीरानी हर तरफ है

नया इक आशियाना ढूँढ लेना
लगे दरिया तुफानी हर तरफ है

नज़ारे देख कर लगता कि जैसे
खुदा की राजधानी हर तरफ है

नदी यह तो बहुत उफनी हुई है
यहाँ कश्ती पुरानी हर तरफ है

कहीँ रोजी हमेँ मिलती नहीँ है
बहुत पिसती जवानी हर तरफ है

यहाँ अब भूख का मंजर दिखेगा
बड़ी बेबस किसानी हर तरफ है

नहीँ बैठो ग़मो का बोझ ले के
जरा देखो रवानी हर तरफ है

यही “आकाश” का पैगाम ले लो
हँसो तो जिन्दगानी हर तरफ है

– आकाश महेशपुरी

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