ग़ज़ल - मिलन के तराने यूँ हम गुनगुना लें

मिलन के तराने यूँ हम गुनगुना लें।
चलो ज़िंदगी को ग़ज़ल हम बना लें।।

मिलें वो कभी तो गले से लगा लें।
मिलें इस क़दर हम ख़ुदी को मिटा लें।।

ये ज़न्नत नही चाहिए बिन तुम्हारे।
चलो हम ज़हन्नुम को ज़न्नत बना लें।।

अग़र जिंदगी हम न जी पाये मिलकर।
चलो मौत को अब गले हम लगा लें।।

छुपा हम न पाए ज़माने से खुद को।
चलो ज़िदगी साथ मिलकर बिता लें।।

नही ‘कल्प’ बाराती शादी मे कोई।
चलो चांँद सूरज बराती बना ले।।
✍🏻 अरविंद राजपूत ‘कल्प’
बह्र:- मुत़कारिब मसम्मन सालिम
वज़्न:- फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122 122 122 122

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 18

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share